
मसूरी–देहरादून में 22 बीघा तक फैली अवैध प्लॉटिंग पर चला बुलडोज़र केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि यह साफ संकेत है कि अब विकास की सड़क पर चालाकी, जोड़-तोड़ और “जगह मेरे हिसाब से काट लेंगे” वाली मानसिकता नहीं चलेगी। और इस बदलाव की कमान जिस व्यक्ति ने अपने हाथ में ली है, वह हैं एमडीडीए के उपाध्यक्ष Banshidhar Tiwari — जिनकी मौजूदगी ही बता देती है कि प्राधिकरण के फैसले अब फाइलों में नहीं, जमीन पर उतरते हैं।
पिछले कुछ समय से देहरादून में अवैध निर्माणों ने रफ्तार ऐसी पकड़ ली थी जैसे कानून उनकी जेब में रखा हो। लेकिन तिवारी ने मैदान में उतरकर यह समीकरण ही बदल दिया। उनकी शैली न दिखावटी है, न ही भाषणों पर आधारित—सीधी, सटीक और बिना डर की। जिस जगह 22 बीघा की अवैध प्लाटिंग को कुछ लोगों ने अपना साम्राज्य समझ रखा था, वहाँ तिवारी की टीम ने जाकर यह साबित कर दिया कि प्राधिकरण की नीतियां कागज़ों में नहीं, क्रियान्वयन में दिखती हैं।
तिवारी की खासियत यही है कि वे “कठोर कार्रवाई” शब्द को कार्रवाई के बाद बोलते हैं, पहले नहीं। जब उनकी टीम जस्सोवाल पहुँची तो किसी तरह की ढिलाई या सौदेबाज़ी की कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी गई। अवैध ढांचों को देखकर लोग भले ही सालों से समझौता करते आए हों, लेकिन तिवारी के नेतृत्व में एमडीडीए ने यह मान लिया है कि शहर की नियोजित बसावट किसी की निजी महत्वाकांक्षा की बली नहीं चढ़ाई जाएगी।
वास्तविक शक्ति वही होती है जो शांत रहकर फैसले ले, और कठोरता वही जो नियमों को बिना भय, बिना पक्षपात लागू कर सके। तिवारी ने दोनों पहलुओं को संतुलित रखते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि देहरादून को अनियोजित बस्तियों और प्लॉटिंग के हवाले करने का दौर खत्म हो चुका है।
व्यंग्य यही है कि जो 22 बीघा को अपनी निजी रजिस्ट्री समझ बैठे थे, उन्होंने शायद अंदाज़ा नहीं लगाया था कि उनके नक्शों पर किसी दिन एक ऐसा अधिकारी भी नज़र डालेगा जिसे “नियम लागू कराने” के लिए न अनुमति की ज़रूरत है, न किसी दबाव का डर।
यह कार्रवाई सिर्फ जमीन साफ करने की नहीं, बल्कि संदेश देने की है—
अगर शहर का भविष्य अव्यवस्थित करने की हिम्मत की जाती है, तो प्राधिकरण में तिवारी जैसे लोग भी हैं जिनके सामने 22 बीघा क्या, 220 बीघा की भी अवैध प्लॉटिंग टिक नहीं सकती।
देहरादून का नक्शा अब नियम तय करेंगे, मनमर्जी नहीं। तिवारी ने यह बात बिना कहे सिद्ध कर दी है।






