
देहरादून में नशे के खिलाफ शुरू हुआ यह महाअभियान सिर्फ एक प्रशासनिक ड्राइव नहीं, बल्कि उस कड़वी सच्चाई पर करारा तमाचा है जिसे समाज लंबे समय से नजरअंदाज़ करता आ रहा था। बच्चे—जो किताबों और करियर के पन्नों में भविष्य ढूँढने चाहिए—अब टेस्टिंग किट्स की लाइनों में खड़े मिल रहे हैं। और कॉलेज–स्कूलों के बाहर जो “कूल कल्चर” के नाम पर बेचा जा रहा था, उसकी असलियत अब सामने लाने की जिम्मेदारी जिला प्रशासन ने अपने हाथ में ले ली है।
देहरादून में ड्रग्स का नेटवर्क कोई नया नहीं था—नए सिर्फ बहाने थे। “हम तो नहीं जानते थे”, “हमारे कॉलेज में नहीं होता”, “बच्चे समझदार हैं”—इन सुविधाजनक वाक्यों के पर्दे के पीछे जो अंधेरा पसरा था, उसे हटाने की शुरुआत की है जिलाधिकारी Savin Bansal ने। उनकी शैली साफ है—कड़े फैसले, ठोस इरादे और किसी भी संस्थान के लिए ढील नहीं।
अब यह दौर नहीं रहेगा कि संस्थान बच्चे ड्रग्स में पकड़े जाएँ और मालिक, डीन या मैनेजमेंट मासूम बन जाएँ। पहली बार जिम्मेदारी वहीं रखी गई है जहाँ होनी चाहिए—उनके सिर पर जो बच्चों के भविष्य के स्वयंभू संरक्षक बने बैठते हैं।
22 बीघा के अवैध प्लॉटिंग वालों की तरह, यहाँ भी कुछ लोगों को लगता था कि नियम उनकी जेब में रखे हैं—नशा चलता रहेगा, दुकानें चलती रहेंगी, और अगर कोई पूछे तो “हमारा क्या लेना देना।” लेकिन अब ट्रैफिक चेकिंग में रात के समय ड्रग टेस्टिंग, मेडिकल स्टोरों में अनिवार्य सीसीटीवी और टेस्टिंग ड्राइव का रोस्टर साफ बता रहा है—देहरादून में नशा करना तो मुश्किल होगा ही, नशा छुपाना उससे भी मुश्किल।
तंज यह है कि समाज उन बच्चों पर तो जल्द उंगली उठा देता है जो भटक जाते हैं, लेकिन उन बड़े लोगों पर चर्चा करने से बचता है जो सप्लाई, ढील और लापरवाही की पूरी चेन बनाते हैं। जिला प्रशासन की यह नई पॉलिसी इस पूरे गठजोड़ पर ही प्रहार है—पहली बार कॉलेज मालिक से लेकर दवा दुकानदार तक, सभी से जवाबदेही की मांग की जा रही है।
एक तरफ किशोर नशे के दलदल में फँस रहे थे, दूसरी तरफ संस्थान अपने ब्रॉशर में “डिसिप्लिन्ड कैम्पस” लिखकर प्रचार कर रहे थे—और इसी दोहरे चेहरे पर अब चोट की गई है।
देहरादून का पहला समर्पित बाल नशा-मुक्ति केंद्र, एम्स के 10 रिजर्व बेड और एंटी-ड्रग्स हेल्पलाइन—ये सिर्फ सुविधाएँ नहीं, बल्कि एक संदेश हैं कि “बच्चों को सुधारना” अब सिर्फ परिवार की जिम्मेदारी नहीं, प्रशासन की प्राथमिकता भी है।
इस पूरे अभियान का सबसे बड़ा व्यंग यही है कि जो समाज आज नशे पर चिंता जताता है, वही कल दुकानों से “बिना बिल वाली दवाएँ” लेकर लौट आता है। मगर इस बार लगता है कि देहरादून में नशे के खिलाफ जंग दिखावे की नहीं, धरातल की है।
और अगर किसी को अभी भी लगता है कि पुराने तरीके चलेंगे—तो उन्हें समझ लेना चाहिए कि नशे के इस अंधेरे में अब प्रशासन की टॉर्च जल चुकी है।






