
जिला प्रशासन की राइफल फंड पहल पर यह पूरा घटनाक्रम एक तरफ जहाँ मानवीय संवेदनशीलता का बेहतरीन उदाहरण है, वहीं दूसरी ओर शासन–प्रशासन की उन पुरानी कार्यप्रणालियों पर एक हल्का मगर सटीक तंज भी है, जिनमें वर्षों से पड़ी धूल अब जाकर साफ होती दिख रही है।
देहरादून के जिलाधिकारी सविन बंसल ने दिखा दिया कि सरकारी फाइलों में दर्ज “लक्जरी ट्रांजैक्शन” कहे जाने वाले राइफल क्लब फंड का उपयोग सिर्फ दिखावे या औपचारिकताओं तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह वही फंड है जिसमें हथियार लाइसेंस संबंधी शुल्क जमा होता है—एक ऐसा स्रोत, जिसका जनता से सीधा सरोकार नहीं माना जाता था। लेकिन प्रशासन ने इसे जरूरतमंदों की जीवनरेखा में बदल दिया।
आज 07 असहाय और निर्बल लोगों को 1.75 लाख की सहायता देकर, जिला प्रशासन ने फिर साबित किया कि संवेदनशील इच्छाशक्ति हो तो “गैर-जरूरी समझे जाने वाले संसाधन भी समाज सेवा का हथियार बन सकते हैं।”
कैंसर पीड़ित रेनू सिंह और जुनतारा देवी को उपचार राशि, विधवा शोभा रावत, सुशीला, सुरभि, पूजा और शकुंतला को 25-25 हजार की मदद—ये सब सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि उन घरों में जली उम्मीद की लौ हैं जहाँ हालात ने अंधेरा फैला रखा था।
तंज यहाँ यह है कि जिस राइफल क्लब फंड का जन्म ही लाइसेंसिंग और औपचारिकताओं के लिए हुआ था, वह अब समाज के सबसे कमजोर वर्गों का “सबसे भरोसेमंद हथियार” बन गया है। एक-एक बुलेट जरूरतमंदों के काम आ रही है—यह वाक्य प्रशासन की रचनात्मक सोच की मिसाल भी है और सिस्टम के पुराने ढर्रे पर व्यंग भी।
अब तक 43 लाभार्थियों को 15 लाख की राशि देकर प्रशासन ने यह भी दिखाया कि शासन की योजनाएँ और फंड तभी सार्थक होते हैं जब उनका लाभ सही हाथों तक पहुँचे। झुग्गी बस्ती की बालवाड़ी की मरम्मत से लेकर कैंसर रोगियों, अनाथ बच्चों, विधवा महिलाओं और स्कूल के बच्चों के वाहन तक—राइफल फंड का हर उपयोग इस बात का सबूत है कि इच्छा हो तो संसाधनों की कमी नहीं, दृष्टिकोण की कमी होती है।
जिलाधिकारी का यह प्रयास केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता का एक साहसिक उदाहरण है—जहाँ फाइलों के नियम से ज्यादा महत्व मानवता के नियमों को दिया गया।
और शायद यही वह बिंदु है जहाँ यह पूरी पहल तंज बन जाती है उस व्यवस्था पर, जिसने दशकों तक ऐसे स्रोतों को सिर्फ औपचारिक राजस्व की तरह देखा—जबकि एक सक्रिय सोच ने इसे समाज की सेवा का साधन बना दिया।
प्रशासन की यह पहल बताती है कि यदि इच्छाशक्ति ईमानदार हो, तो सरकारी सिस्टम भी जरूरतमंदों के लिए वर्दी पहनकर उतना ही संवेदनशील हो सकता है जितना एक आम नागरिक।






