
तहसील परिसर में स्थित रमन एंटरप्राइजेज सीएससी सेंटर पर की गई प्रशासनिक कार्रवाई केवल एक औपचारिक छापेमारी नहीं, बल्कि उन जनसेवा केंद्रों के लिए सख्त संदेश है जो जनता की सुविधा को अपना निजी कारोबार समझ बैठे हैं। जिलाधिकारी सविन बंसल के निर्देश पर हुई इस कार्रवाई ने साफ कर दिया कि “जनसेवा की दुकानदारी” अब नहीं चलेगी, चाहे ताला ही क्यों न लगाना पड़े।
निरीक्षण में जो अनियमितताएँ सामने आईं, वे किसी छोटी गलती का परिणाम नहीं बल्कि यह संकेत हैं कि कई केंद्र वर्षों से बिना डर और बिना नियम काम कर रहे थे। आवेदकों के हस्ताक्षर के बिना आवेदन फार्म मिलना, निर्धारित दरों से अधिक शुल्क वसूलना, रजिस्टर अद्यतन न होना—ये सब उस मानसिकता की झलक है जिसमें सीएससी ऑपरेटर खुद को सेवा प्रदाता नहीं, सर्वशक्तिमान बिचौलिया समझने लगते हैं।
जब जिला प्रशासन ने पूछताछ की तो स्टाफ का जवाब न दे पाना इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण था कि केंद्र की कार्यशैली पारदर्शी नहीं थी। मानो वे खुद ही न जानें कि वे क्या कर रहे हैं—या फिर जानते हों, पर बताते हुए डर रहे हों। दोनों ही स्थिति जनहित के लिए घातक हैं।
व्यंग्य यह है कि जनसेवा केंद्र, जिसका नाम ही जनता के लिए सेवा का वादा करता है, वह जनता से ही अधिक शुल्क वसूलने, हस्ताक्षर तक गायब रखने और रजिस्टर तक अपडेट न करने जैसे कामों में व्यस्त पाया गया। यह ऐसी विडंबना है जैसे अस्पताल में स्वास्थ्य न मिले और स्कूल में शिक्षा न।
उपजिलाधिकारी कुमकुम जोशी की अगुवाई में लगाया गया ताला मात्र एक सेंटर पर नहीं लगा, बल्कि उस मानसिकता पर लगा जिसने जनसेवा को कमाई का शॉर्टकट बना दिया था। प्रशासन ने साफ कर दिया कि जिले के अन्य सीएससी केंद्र भी यदि इसी राह पर चलते पाए गए तो ताले की चाभी तैयार है।
यह पूरा प्रकरण प्रशासनिक सक्रियता का उदाहरण तो है ही, साथ ही उन “सेवा प्रदाताओं” पर एक कड़ा तंज भी है जो शिकायत मिलने पर तो फूल जैसे नरम हो जाते हैं, लेकिन आम नागरिक से शुल्क लेते समय पत्थर जैसी कठोरता दिखाते हैं।
जिलाधिकारी की यह चेतावनी समय पर और जरूरी है कि पारदर्शिता से समझौता नहीं होगा। जो केंद्र नियमों का पालन करेंगे, वे चलेंगे; बाकी के लिए प्रशासन दरवाजा बंद करने में देर नहीं करेगा।
कुल मिलाकर, यह कार्रवाई जनता को राहत और उन केंद्रों को चिंता दोनों देती है, जो खुद को प्रणाली से ऊपर समझते हैं। प्रशासन का यह संदेश साफ है—जनसेवा कोई सुविधा नहीं, जिम्मेदारी है; और जिम्मेदारी निभाई नहीं गई तो ताला पड़ना तय है।






