
जौलीग्रांट एयरपोर्ट विस्तार को लेकर जिलाधिकारी सविन बंसल का तेवर साफ है—राज्य की इस महत्वाकांक्षा के बीच जो भी आएगा, वह या तो हटेगा या हटाया जाएगा। बैठक में उनकी भाषा किसी औपचारिक चर्चा से ज्यादा एक स्पष्ट चेतावनी की तरह थी। एयरपोर्ट न केवल महत्त्वाकांक्षा का प्रोजेक्ट है, बल्कि उत्तराखंड को नए आयाम पर ले जाने वाला प्रवेश-द्वार भी है। ऐसे में बंसल का यह रुख बिल्कुल उसी कप्तान जैसा है जो जहाज़ को तूफान में देखकर अपनी टीम से कहता है—“ढील दी तो डूबेंगे।”
मुआवजा वितरण में देरी पर उनका सख्त संदेश प्रशासन के उस हिस्से को संबोधित था जो “फाइलें चलने में समय लगता है” जैसे बहानों के सहारे बैठा रहता है। डीएम ने स्पष्ट कर दिया कि एयरपोर्ट विस्तार में कोई भी ढिलाई “अनुमन्य नहीं”—मतलब साफ है कि यह प्रोजेक्ट अब घोंघे की चाल नहीं, बुलट ट्रेन की रफ्तार से चलेगा।
बैठक का सबसे दिलचस्प और तंज भरा हिस्सा था डंपिंग यार्ड पर उनकी नाराजगी। नगर पालिका को साफ शब्दों में बता दिया गया कि जब तक ट्रामेल और पोकलैंड मशीनें नहीं खरीद ली जातीं, तब तक किसी भी प्रस्ताव पर मुहर नहीं लगेगी। यानी CM के ड्रीम प्रोजेक्ट में बाधा डालने वालों की फाइलों पर फिलहाल ताला—और वह भी प्रशासन की तरफ से।
कचरा निस्तारण को लेकर जो निर्देश दिए गए, वे निश्चित रूप से उस पुराने रवैये पर व्यंग्य हैं जिसमें नगर पालिका समस्या आने पर “बैठक करने” का विकल्प चुनती है और समाधान को “अगली बैठक” तक टाल देती है। डीएम ने साफ कहा—“कूड़ा हटाओ, बर्ड हिट रोकना अनिवार्य है।” एयरपोर्ट के आसपास के दुकानदारों और रेस्टोरेंट वालों की जांच का आदेश उसी सामाजिक मानसिकता पर व्यंग्य है जिसमें लोग सोचते हैं कि “मेरा थोड़ा-सा कचरा किसी को क्या नुकसान देगा”—जबकि वहीं से बर्ड स्ट्राइक जैसी गंभीर घटनाएँ जन्म लेती हैं।
डोईवाला में डंपिंग यार्ड बदलने का निर्णय भी इस बात को रेखांकित करता है कि अब “जगह नहीं है” वाला बहाना स्वीकार्य नहीं होगा। सात दिन की समय सीमा देकर डीएम ने व्यवस्था को याद दिलाया कि सरकारी जमीन खोजने का काम महीनों नहीं, हफ्तों में भी हो सकता है—बशर्ते ईमानदारी से किया जाए।
एयरफील्ड पर्यावरण प्रबंधन की बैठक में उठे सवाल—पेड़ों की ऊंचाई, मांस की दुकानों की निकटता, नालियों की क्षमता—ये सब लंबे समय से चल रही समस्याएँ थीं जिन पर आम तौर से “नोट किया गया” लिखकर छोड़ दिया जाता था। मगर इस बार जिलाधिकारी ने इन्हें तात्कालिक प्राथमिकता में रख दिया।
यह ब्लॉग उसी सख्त संदेश की तरह है जो जिलाधिकारी ने बैठक में दिया—कि राज्य की प्रतिष्ठा, सुरक्षा और विकास के मामले में अब कोई शिथिलता नहीं चलेगी। अगर एयरपोर्ट को वर्ल्ड मैप पर चमकाना है तो आसपास की अव्यवस्थाओं को मिटाना ही होगा। और इस बार प्रशासन के तेवर देखकर यही लगता है कि “उड़ान में बाधा डालने वालों” को सावधान होने की जरूरत है।
साफ है—जौलीग्रांट एयरपोर्ट केवल रनवे नहीं, उत्तराखंड की उड़ान का प्रतीक बनने वाला है। और कप्तान ने अब यह तय कर लिया है कि उड़ान किसी भी हाल में तय समय पर भरेगी।






