
जैसे फिल्मों में नायक भीड़ के बीच उतरकर सीधे लोगों की सुनता है, ठीक वैसा ही दृश्य अब देहरादून के इठारना गांव में बनने जा रहा है—लेकिन फर्क ये है कि यहां कैमरा नहीं, प्रशासनिक ईमानदारी चल रही है। जिलाधिकारी सविन बंसल ने तय कर दिया है कि विकास की असल परीक्षा दफ्तरों के एयर-कंडीशनर के नीचे नहीं, बल्कि गांव की पगडंडियों और जनता की धड़कनों के बीच होती है। इसलिए इस बार सिर्फ फाइलें नहीं चलेंगी, अधिकारी खुद चलेंगे—वो भी गांव की उन्हीं पगडंडियों पर, जिनसे रोज आम आदमी ठोकर खाता है।
सरकार की योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने की प्रतिज्ञा तो हर सरकार करती है, लेकिन पहली बार ऐसा महसूस होगा कि प्रशासन “अंतिम व्यक्ति” को ढूंढ़ने खुद जा रहा है। 25 से अधिक विभाग, एक ही छत के नीचे—ये सिर्फ शिविर नहीं, प्रशासन की चलती-फिरती मिनी सचिवालय है। पेंशन, आयुष्मान कार्ड, आधार, केसीसी, बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य, स्कूल, अस्पताल—कागजों का नहीं, लोगों का सोशल ऑडिट होगा। जनता पहली बार परखेगी कि फाइलों में लिखी सुविधाएं जमीन पर कितनी बची हैं।
और हां, कुछ विभागों के लिए ये शिविर किसी फिल्मी सीन से कम नहीं—
“बाबू साहेब… आज आपकी कलम नहीं, आपकी नीयत की जांच होगी।”
अगर कोई कल्पना करे कि गांव के मंदिर परिसर में, पंचायतघर की छांव में अधिकारी नागरिकों के बीच बैठकर तुरंत समाधान दे रहे हैं—तो यह वही दृश्य है, जिसके लिए वर्षों से ग्रामीण तरसते आए हैं। महीनों चक्कर काटने वाली औपचारिकताएं अब कुछ मिनटों में पूरी होंगी।
इस शिविर का असली संदेश यह है कि फैसले बंद कमरों में नहीं, धूल-धक्कड़ वाले रास्तों पर बनते हैं। और प्रशासन का यह कदम बताता है कि सरकार अब “कागजों पर विकास” के भ्रम से आगे बढ़कर “जमीन पर व्यवस्था” दिखाने के मूड में है।
इठारना में 1 दिसंबर को होने वाली इस पहल में शिकायतें सिर्फ सुनी नहीं जाएंगी—मौके पर ही निस्तारित होंगी। यही वह संवाद है जिसकी लोकतंत्र को जरूरत है, और यही वह दृश्य है जिसे देखकर गांव के बुजुर्ग शायद गर्व से कहें—
“आज पहली बार लगा कि सरकार सचमुच हमारे दरवाजे आई है।”






