नशा तस्करों की कमर टूटी तो मचा सियासी-अफसरशाही तूफान, किसान की मौत की आड़ में कप्तान मणिकांत मिश्रा को घेरने की बड़ी साजिश

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एसएसपी मणिकांत मिश्रा

ऊधमसिंहनगर कभी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नशा तस्करों का सुरक्षित गलियारा माना जाने लगा था। सीमाएं धुंधली थीं, नेटवर्क मजबूत था और सिस्टम की खामोशी तस्करों के लिए सबसे बड़ी ढाल। लेकिन जब कप्तान मणिकांत मिश्रा ने नशे के खिलाफ सर्जिकल प्रहार शुरू किया तो यह धंधा पहली बार हिलता दिखा। गिरोह टूटे, सप्लाई चेन बिखरी और जिन चेहरों की परछाइयाँ फाइलों में दबी रहती थीं, उनके दरवाजों तक कानून की दस्तक पहुँची। नतीजा यह हुआ कि नशे पर कार्रवाई से पहले जिनका पाचन दुरुस्त था, उनके पेट में अचानक मरोड़ उठने लगी।
यही वह मोड़ था जहाँ असली कहानी शुरू होती है। नशा तस्करों की कमर टूटते ही एक किसान की दुखद मौत को बहाना बनाकर कप्तान के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिशें तेज़ हो गईं। सवाल संवेदना का नहीं, सवाल साजिश की टाइमिंग का है। जिस दिन नेटवर्क पर प्रहार तेज़ हुए, उसी दिन अफवाहों का बाजार गर्म हुआ। जो लोग कल तक नशे पर चुप थे, आज नैतिकता के ठेकेदार बनकर मोर्चा संभालते दिखे। पीड़ा वास्तविक हो सकती है, पर पीड़ा पर राजनीति का मुलम्मा चढ़ाकर उसे हथियार बनाना किसे सूट करता है, यह समझना मुश्किल नहीं।
नशे के कारोबार में केवल सड़क का अपराधी नहीं होता। इसमें वर्दी के बाहर और भीतर बैठे ऐसे चेहरे भी होते हैं, जिनकी कुर्सी कार्रवाई से हिलती है। इसलिए जब कप्तान ने यूपी–उत्तराखंड के गठजोड़ को तोड़ा, तो सिर्फ तस्कर नहीं, कुछ दिग्गज अफसर और नेता भी असहज हुए। कार्रवाई जितनी तेज़ थी, उतनी ही तेज़ प्रतिक्रिया भी आई—चरित्रहनन, चयनित आक्रोश और आधे सच की पूरी कहानियाँ। तंज यह कि जो कल तक नशे से तबाह हो रहे युवाओं पर खामोश थे, आज कानून के रखवालों पर सवालों की बौछार कर रहे हैं।
यह भी संयोग नहीं कि “माहौल” शब्द सबसे ज़्यादा उन्हीं की जुबान पर है जिनके हित प्रभावित हुए हैं। माहौल बनाया जाता है, तथ्य पेश किए जाते हैं। जांच होती है, पर जांच को डराने की कोशिश नहीं होती। अगर जवाबदेही चाहिए तो वह निष्पक्ष जांच से आएगी, न कि भीड़ के शोर से। नशे के खिलाफ हड़कंप इसलिए मचा क्योंकि पहली बार किसी ने जड़ पर हाथ डाला। और जड़ पर हाथ पड़ते ही पत्तों ने शोर मचाना शुरू कर दिया।
अंत में सवाल सरल है, क्या हम नशे के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई चाहते हैं या हर सख्त कदम पर भावनाओं की आड़ में उसे रोक देना चाहते हैं? अगर सच में किसान, युवा और समाज की चिंता है, तो कानून को काम करने दीजिए। क्योंकि जब कप्तान डगमगाता है, तो नाव नहीं, पूरा किनारा डूबता है।

Khushi
Author: Khushi

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