गीता धामी के संकल्प से सजी उत्तरायणी कौथिक–2026, लोकसंस्कृति, स्वाभिमान और उत्तराखंडियत का विराट उत्सव

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उत्तरायणी कौथिक महोत्सव केवल चार दिन का आयोजन नहीं, यह उत्तराखंड की आत्मा का सार्वजनिक उत्सव है। यह वह मंच है जहाँ पहाड़ की मिट्टी बोलती है, लोक की स्मृति सांस लेती है और परंपरा आधुनिक समय से संवाद करती है। परेड ग्राउंड में सजेगा यह कौथिक किसी इवेंट कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक उत्तराधिकार की घोषणा है जिसे हमने समय की भीड़ में कहीं धुंधला होने दिया था। सेवा संकल्प फाउंडेशन ने इस महोत्सव के माध्यम से यह साफ संदेश दिया है कि उत्तराखंड की पहचान केवल प्राकृतिक सौंदर्य नहीं, बल्कि उसकी लोकधारा, उसके कारीगर, उसके गीत, उसकी स्त्रियाँ और उसका स्वाभिमान है।
यह आयोजन उस सोच को मजबूती देता है जहाँ सम्मान पद या प्रचार का मोहताज नहीं, बल्कि कर्म और संकल्प से उपजता है। ‘नंदा शिखर सम्मान’ के जरिए उन लोगों को सामने लाया जाना, जिन्होंने गांव, समाज और संस्कृति को अपने श्रम से रोशन किया, दरअसल नई पीढ़ी के लिए दिशा-सूचक है। राज्यपाल और मुख्यमंत्री के करकमलों से दिया जाने वाला यह सम्मान सत्ता की मुहर से ज्यादा समाज की स्वीकृति का प्रतीक है।
वोकल फॉर लोकल यहाँ नारा नहीं, जमीन पर उतरी हुई सच्चाई है। तेरह जिलों से आए कारीगरों के निःशुल्क स्टॉल आत्मनिर्भरता की सबसे ईमानदार तस्वीर पेश करते हैं। यह बाजार मुनाफे का नहीं, मान-सम्मान का है, जहाँ हाथ की मेहनत और लोकबुद्धि को पहचान मिलती है। मिलेट्स की खुशबू, हथकरघे की बनावट, लोकखानपान का स्वाद,सब मिलकर यह याद दिलाते हैं कि आधुनिकता की दौड़ में अपनी जड़ों से कटना विकास नहीं, बल्कि विस्मृति है।
शोभायात्रा इस महोत्सव की धड़कन है। मां नंदा देवी और गोलज्यू महाराज की डोलियों के साथ जब ढोल-नगाड़े गूंजेंगे और जौनसारी, गढ़वाली, कुमाऊँनी, गोर्खाली, पंजाबी रंग सड़कों पर उतरेंगे, तब देहरादून केवल शहर नहीं रहेगा,वह पूरी देवभूमि का प्रतिनिधि बन जाएगा। यह दृश्य बताता है कि विविधता यहाँ विभाजन नहीं, बल्कि सौंदर्य है।
लोकगायकों की प्रस्तुतियाँ मनोरंजन भर नहीं, स्मृति का पुनर्जागरण हैं। नेगी जी की आवाज़, पवनदीप की ऊर्जा, लोकधुनों की लय—ये सब मिलकर उस सांस्कृतिक पुल का निर्माण करते हैं जो बीते कल को आने वाले कल से जोड़ता है। बच्चों और महिलाओं के लिए रचनात्मकता और आत्म-सुरक्षा के कार्यक्रम यह स्पष्ट करते हैं कि संस्कृति तभी जीवित रहती है जब वह वर्तमान की जरूरतों से जुड़ती है।
उत्तरायणी कौथिक महोत्सव दरअसल उत्तराखंडियत का उत्सव है,सरल, स्वाभिमानी और सामूहिक। यह आयोजन हमें याद दिलाता है कि संस्कृति संग्रहालय की वस्तु नहीं, जीवित परंपरा है। यहाँ आकर देखना नहीं, शामिल होना जरूरी है, क्योंकि जब समाज खुद अपनी विरासत का उत्सव बन जाता है, तभी वह सुरक्षित रहती है।

Khushi
Author: Khushi

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