

देहरादून के परेड ग्राउंड से उठती ढोल–दमाऊ, शंखनाद और लोकगीतों की गूंज केवल एक सांस्कृतिक आयोजन का उद्घोष नहीं थी, बल्कि वह उत्तराखंड की आत्मा का सार्वजनिक प्रकटीकरण था। उत्तरायणी कैथिक महोत्सव 2026 ने यह स्पष्ट कर दिया कि संस्कृति केवल स्मृतियों में सहेजने की वस्तु नहीं, बल्कि समाज की चेतना, दिशा और विकास का मूल आधार है। “संस्कृति से समृद्धि की ओर” का संदेश किसी मंचीय नारे की तरह नहीं, बल्कि पूरे शहर में बहते अनुभव की तरह महसूस हुआ।
देवभूमि के इतिहास में यह क्षण इसलिए भी विशिष्ट बन गया क्योंकि पहली बार किसी मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी ने न केवल औपचारिक उपस्थिति दर्ज कराई, बल्कि स्वयं परंपरा की वाहक बनकर कलश यात्रा का नेतृत्व किया। श्रीमती गीता धामी का यह कदम प्रतीकात्मक भर नहीं था, बल्कि उसने लोकसंस्कृति को सत्ता के गलियारों से निकालकर जन–जन के हृदय तक पहुंचाने का कार्य किया। कलश सिर पर धारण किए जब वह देहरादून की सड़कों पर आगे बढ़ीं, तो वह दृश्य उत्तराखंडियत के आत्मसम्मान का जीवंत चित्र बन गया।
लैंसडाउन चौक से लेकर घंटाघर, गांधी पार्क और कनक चौक तक निकली शोभा यात्रा किसी एक क्षेत्र या एक परंपरा की प्रतिनिधि नहीं थी। उसमें गढ़वाल, कुमाऊं, जौनसार, गोरखा और पंजाबी संस्कृतियों का संगम था। यह वही देहरादून था जो अक्सर ‘मिनी इंडिया’ कहा जाता है, लेकिन उस दिन यह ‘मिनी देवभूमि’ बन गया था। छोलिया और जौनसारी नृत्य की थाप पर थिरकते कदम, पारंपरिक वेशभूषा में सजे कलाकार और लोकवाद्यों की स्वर लहरियां—इन सबने मिलकर शहर को एक जीवित लोकचित्र में बदल दिया।
सबसे महत्वपूर्ण यह रहा कि यह आयोजन केवल देखने का नहीं, महसूस करने का था। सड़क किनारे खड़े लोग दर्शक नहीं थे, वे सहभागी थे। ऐसा लग रहा था मानो उत्तराखंड की मिट्टी, उसके पर्व, उसकी स्मृतियां और उसकी पहचान हर व्यक्ति के कण–कण में समाहित हो गई हों। लंबे समय बाद देहरादून ने अपने शहरी आवरण के भीतर छिपी उस लोक आत्मा को खुले तौर पर जीया, जिसे अक्सर विकास की दौड़ में पीछे छोड़ दिया जाता है।
यह महोत्सव इस मायने में भी ऐतिहासिक रहा कि उसने संस्कृति को किसी संग्रहालय की वस्तु की तरह प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उसे जीवंत, गतिशील और समकालीन संदर्भों से जोड़ा। लोककला, हस्तशिल्प, पारंपरिक व्यंजन और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां केवल अतीत की झलक नहीं थीं, बल्कि भविष्य की दिशा का संकेत थीं—जहां विकास अपनी जड़ों से कटकर नहीं, बल्कि उनसे जुड़कर आगे बढ़े।
उत्तरायणी कैथिक महोत्सव 2026 ने यह साबित कर दिया कि जब लोकपरंपरा को सम्मान, मंच और नेतृत्व मिलता है, तो वह समाज को जोड़ने की सबसे बड़ी शक्ति बन जाती है। यह आयोजन देहरादून के लिए सिर्फ एक महोत्सव नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण था। उस दिन सचमुच ऐसा प्रतीत हुआ मानो देवभूमि विभिन्न संस्कृतियों की पोशाक पहनकर स्वयं सड़कों पर उतर आई हो—और हर उत्तराखंडवासी ने उसे अपने भीतर महसूस किया






