
देहरादून में शिक्षा को लेकर जो काम वर्षों में नहीं हो पाया, वह अब ठोस योजना, स्पष्ट विज़न और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के साथ ज़मीन पर उतरता दिख रहा है। जिलाधिकारी सविन बंसल की यह पहल किसी औपचारिक योजना की खानापूर्ति नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था को निजी स्कूलों के समकक्ष खड़ा करने का गंभीर प्रयास है।
168 राजकीय माध्यमिक विद्यालयों में 884 स्मार्ट टीवी की स्थापना केवल आंकड़ा नहीं है, यह उस सोच का प्रमाण है जिसमें सरकारी स्कूल को पिछड़ा मानने वाली मानसिकता को तोड़ने का साहस दिखाई देता है। डीएम सविन बंसल ने यह साफ कर दिया है कि शिक्षा में गुणवत्ता का अधिकार केवल शहरों या महंगे स्कूलों तक सीमित नहीं रहेगा।
3.67 करोड़ की धनराशि जिला खनन न्यास से उपलब्ध कराकर उन्होंने यह भी दिखाया कि यदि प्रशासक चाहे तो संसाधनों की कमी कभी बाधा नहीं बनती। इससे पहले 5 करोड़ के CSR फंड से सभी सरकारी विद्यालयों को फर्नीचर युक्त करना और अब हर कक्षा में स्मार्ट तकनीक पहुंचाना—यह निरंतरता बताती है कि यह कोई एक दिन का प्रयोग नहीं, बल्कि सिस्टम सुधार का मॉडल है।
सविन बंसल का सबसे मजबूत पक्ष यह है कि वह योजनाओं को केवल घोषित नहीं करते, बल्कि पारदर्शी, तकनीकी और समयबद्ध तरीके से लागू कराते हैं। GeM पोर्टल के माध्यम से ई-टेंडर, 12 फर्मों की प्रतिस्पर्धा, तकनीकी- वित्तीय समिति का गठन—यह सब दर्शाता है कि काम सिर्फ हुआ नहीं, बल्कि सही तरीके से हुआ।
स्मार्ट टीवी के जरिए दीक्षा पोर्टल, पीएम ई-विद्या, डिजिटल कंटेंट और वर्चुअल कक्षाओं तक बच्चों की पहुंच, ग्रामीण और शहरी स्कूलों के बीच डिजिटल खाई को पाटने की दिशा में बड़ा कदम है। यह वही ज़मीन है जहां भविष्य की प्रतिस्पर्धा तय होती है, और डीएम ने उसी मोर्चे पर सीधा हस्तक्षेप किया है।
यह पहल साबित करती है कि सविन बंसल केवल प्रशासन चलाने वाले अधिकारी नहीं, बल्कि नीति को ज़मीन पर बदलने वाले, परिणाम देने वाले और शिक्षा को सामाजिक निवेश मानने वाले सबसे मजबूत जिलाधिकारियों में से एक हैं। देहरादून मॉडल अगर इसी तरह आगे बढ़ता है, तो यह प्रदेश ही नहीं, देश के लिए एक उदाहरण बनेगा।







