सेवा संकल्प धारिणी गीता धामी, जिनके कार्य से देवभूमि में समाज, संस्कृति और सहभागिता को नई दिशा मिल रही है

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देवभूमि उत्तराखंड की पहचान केवल उसके पर्वत, नदियां और तीर्थ ही नहीं हैं, बल्कि वह विचारधारा भी है जो समाज को जोड़ती है, संस्कृति को जीवित रखती है और अंतिम व्यक्ति तक सेवा का भाव पहुंचाती है। इसी विचारधारा की सजीव मिसाल बनकर आज प्रदेश में एक नाम निरंतर उभरता है – गीता धामी। यह नाम केवल मुख्यमंत्री की पत्नी होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नाम सेवा, संकल्प, संस्कृति और सामाजिक चेतना का प्रतीक बन चुका है।
गीता धामी ने स्वयं को कभी किसी पद, प्रोटोकॉल या औपचारिक पहचान तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य समाज के उन वर्गों तक पहुंचना बनाया, जो अक्सर नीतियों और योजनाओं की मुख्य धारा से छूट जाते हैं। उनका काम मंचों से ज्यादा ज़मीन पर दिखता है — गांव, मोहल्ले, महिलाएं, बच्चे, युवा, बुजुर्ग और वह आमजन जिनके लिए सेवा सबसे बड़ा संबल होती है।
सेवा संकल्प फाउंडेशन के माध्यम से गीता धामी ने यह सिद्ध किया है कि समाज कल्याण केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि संवेदनशील नेतृत्व और निरंतर संवाद से संभव होता है। शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, स्वच्छता, नशा मुक्ति, पर्यावरण संरक्षण और लोक संस्कृति के संरक्षण जैसे विषयों पर उनका काम किसी अभियान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक सतत जन आंदोलन का रूप ले चुका है।
उत्तरायणी कौथिक जैसे आयोजन केवल उत्सव नहीं, बल्कि गीता धामी की उस सोच का प्रतिबिंब हैं जिसमें संस्कृति को जड़ों से जोड़कर भविष्य की पीढ़ी तक पहुंचाया जाता है। लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक खेल, स्थानीय उत्पाद और साहित्य — ये सभी उनके प्रयासों से एक मंच पर जीवंत होते हैं। यह संदेश स्पष्ट है कि आधुनिकता के साथ अपनी पहचान बचाए रखना ही सच्चा विकास है।
गीता धामी का दृष्टिकोण केवल वर्तमान तक सीमित नहीं है। वह भविष्य की चिंता करती हैं — ऐसा भविष्य जिसमें उत्तराखंड का युवा अपनी जड़ों पर गर्व करे, महिलाएं आत्मनिर्भर बनें, बच्चे संस्कारों के साथ आगे बढ़ें और समाज नशा, असमानता और उपेक्षा जैसी समस्याओं से मुक्त हो। उनका मानना है कि जब तक समाज का अंतिम व्यक्ति सशक्त नहीं होगा, तब तक विकास अधूरा है।
उनका कार्य यह भी दिखाता है कि सत्ता के साथ संवेदनशीलता जुड़ जाए तो जनकल्याण की दिशा और गति दोनों बदल सकती हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य जिस विकास पथ पर आगे बढ़ रहा है, उसमें गीता धामी की भूमिका एक सामाजिक सेतु की तरह है — सरकार और समाज के बीच, नीति और ज़मीन के बीच, विचार और क्रियान्वयन के बीच।
देवभूमि में ऐसे लोग वास्तव में विरले होते हैं, जो बिना शोर किए, बिना किसी अपेक्षा के, निरंतर समाज के लिए काम करते हैं। गीता पुष्कर उसी श्रेणी में आती हैं। उनका नाम आज उत्तराखंड में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में यह संदेश देता है कि सेवा कोई औपचारिक दायित्व नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है।
गीता नाम स्वयं में एक अर्थ रखता है — कर्म, संतुलन और लोकहित। और जब यह नाम “पुष्कर” के साथ जुड़ता है, तो उसका अर्थ और भी व्यापक हो जाता है — ऐसा पुष्कर जो समाज की प्यास बुझाए, अंतिम व्यक्ति तक आशा और सहयोग पहुंचाए। यही कारण है कि गीता पुष्कर आज केवल एक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि एक प्रेरणा बन चुकी हैं — उत्तराखंड के लिए, और भारत के लिए।

Khushi
Author: Khushi

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