अपराधियों का काल बनकर उतरे IPS परमेंद्र डोबाल, राजधानी में जीरो टॉलरेंस की तैयारी

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राजधानी देहरादून में जब कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हों, जब 16 दिनों में 5 हत्याएं जनता के मन में भय पैदा कर चुकी हों, तब एक सख्त, निर्णायक और परिणाम देने वाले अधिकारी की जरूरत होती है। ऐसे समय में देहरादून की कमान आईपीएस प्रमेन्द्र डोबाल को सौंपा जाना केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं, बल्कि स्पष्ट संदेश है,अब अपराधियों के लिए जमीन सख्त होने वाली है।
उत्तराखंड शासन के बड़े प्रशासनिक बदलाव के तहत पूर्व एसएसपी अजय सिंह को एसटीएफ की जिम्मेदारी दी गई और हरिद्वार में अपनी तेजतर्रार कार्यशैली से पहचान बना चुके डोबाल को राजधानी की कमान सौंपी गई। यह निर्णय अपने आप में संकेत है कि अब “रूटीन पुलिसिंग” नहीं, बल्कि “रिजल्ट पुलिसिंग” की अपेक्षा है।
डोबाल की पहचान केवल एक अधिकारी की नहीं, बल्कि एक रणनीतिक कमांडर की रही है। वे अपराधी को केवल गिरफ्तार करने में विश्वास नहीं रखते, बल्कि उसके नेटवर्क, आर्थिक स्रोत और संरक्षण तंत्र को तोड़ने की कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं। राजधानी में सक्रिय हिस्ट्रीशीटर, गैंग संचालक, भूमाफिया और नशा तस्कर यह समझ लें कि अब फाइलें खुलेंगी, पुराने रिकॉर्ड खंगाले जाएंगे और कानून की पकड़ सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहेगी।
राजपुर जैसे पॉश क्षेत्र में हुई हत्या और शहर में बाहरी राज्यों के कुख्यात अपराधियों की मौजूदगी ने पुलिस की खुफिया प्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में डोबाल के सामने पहली चुनौती खुफिया तंत्र को मजबूत करना, थानों की जवाबदेही तय करना और जमीनी स्तर पर चौकसी बढ़ाना होगा। उनका पहला दिन ही यह संकेत दे गया कि वे प्रतीकात्मक नहीं, सक्रिय नेतृत्व में विश्वास रखते हैं,तुरंत कार्यभार ग्रहण करना और टीम के साथ स्पष्ट संवाद स्थापित करना इसका प्रमाण है।
लेकिन “अपराधियों का काल” होने का अर्थ केवल सख्ती नहीं होता। मजबूत पुलिसिंग का दूसरा चेहरा है—जनता का विश्वास। महिला सुरक्षा, ट्रैफिक प्रबंधन और आम नागरिक की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई—ये वे क्षेत्र हैं जहां राजधानी की पुलिस की असली परीक्षा होती है। डोबाल यदि इन तीन मोर्चों पर दृढ़ और पारदर्शी व्यवस्था स्थापित कर देते हैं, तो जनता का भरोसा स्वतः लौटेगा।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का यह निर्णय राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है। राजधानी की कानून व्यवस्था राज्य सरकार की साख से सीधे जुड़ी होती है। ऐसे में डोबाल पर भरोसा यह दर्शाता है कि अब अपराध के प्रति शून्य सहनशीलता की नीति को जमीन पर उतारने का समय है।
देहरादून लंबे समय तक शांत शहर की पहचान रखता रहा है। पिछले दिनों की घटनाओं ने उस छवि को झटका दिया है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि क्या डोबाल अपने सख्त और संगठित पुलिसिंग मॉडल से अपराधियों के हौसले तोड़ पाते हैं, क्या थानों की कार्यसंस्कृति में अनुशासन और जवाबदेही ला पाते हैं, और क्या जनता को यह भरोसा दिला पाते हैं कि कानून अभी भी सबसे ऊपर है।
यदि उनकी कार्यशैली वही रही, जिसके लिए वे जाने जाते हैं, तो आने वाले समय में देहरादून में एक नई तस्वीर दिख सकती है,जहां अपराधी नाम सुनकर सतर्क हों और आम नागरिक निडर होकर जीवन जी सके। प्रमेन्द्र डोबाल का मतलब सिर्फ नया एसएसपी नहीं, बल्कि राजधानी में कानून के कठोर और संवेदनशील संतुलन की वापसी भी हो सकता है।

Khushi
Author: Khushi

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