
गलगोटिया यूनिवर्सिटी का नाम कभी “विश्व विख्यात” की सूची में गिनाया जाता था, लेकिन हाल की घटना ने उसे बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। एआई समिट जैसे मंच पर दिखाए गए रोबोट को लेकर उठे सवाल अब सिर्फ एक तकनीकी गलती नहीं रहे—यह विश्वसनीयता का प्रश्न बन चुके हैं। क्या सच में वह संस्थान का अपना नवाचार था, या प्रस्तुति में पारदर्शिता की कमी रह गई?
शिक्षा संस्थान सिर्फ डिग्री देने की फैक्ट्री नहीं होते, वे भरोसे के स्तंभ होते हैं। जब मंच अंतरराष्ट्रीय हो और दावा “इनोवेशन” का, तब एक-एक शब्द की जिम्मेदारी बनती है। अगर तकनीक खरीदी गई थी तो क्या उसे स्पष्ट रूप से बताया गया? और अगर नहीं बताया गया, तो क्यों?
मोटी फीस देने वाले छात्र और उनके अभिभावक यह जानना चाहते हैं कि उन्हें ब्रांड मिल रहा है या वास्तविक शोध-संस्कृति। सवाल यह भी है कि क्या जांच होगी, क्या जवाबदेही तय होगी, या मामला कुछ दिनों की सुर्खियों के बाद ठंडा पड़ जाएगा?
यह सिर्फ एक यूनिवर्सिटी की बात नहीं है—यह उस नैरेटिव की बात है जिसमें “आत्मनिर्भरता” और “इनोवेशन” जैसे शब्द बड़ी आसानी से मंचों पर गूंजते हैं। अब देखना है, क्या स्पष्टीकरण भी उतनी ही स्पष्टता से आता है?







