संगठन की आत्मा से जुड़ा नेतृत्व, कार्यकर्ता के सम्मान में शक्ति तलाशते मुख्य सेवक धामी

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राजनीति में कई चेहरे आते हैं, भाषण देते हैं, घोषणाएं करते हैं और चले जाते हैं। लेकिन कुछ नेता ऐसे होते हैं जो मंच से उतरकर भी उतने ही बड़े दिखाई देते हैं जितने मंच पर खड़े होकर। सीएम धामी का चिन्यालीसौड़ दौरा ऐसी ही एक कहानी कहता है,सत्ता की नहीं, संवेदना की; पद की नहीं, प्रतिबद्धता की।
“जन जन की सरकार, जन जन के द्वार” कार्यक्रम में उन्होंने सुदूर इलाकों से आए लोगों की समस्याएँ सुनीं, अधिकारियों को मौके पर निर्देश दिए,यह प्रशासनिक दक्षता थी। लेकिन असली कहानी वहाँ शुरू होती है जहाँ प्रोटोकॉल समाप्त हो जाता है। जब उन्हें पता चला कि एक बूथ अध्यक्ष की पुत्री का विवाह है, तो उन्होंने सुरक्षा घेरे और औपचारिकताओं से परे जाकर उस घर की चौखट पर दस्तक दी। यह केवल एक शिष्टाचार भेंट नहीं थी; यह उस कार्यकर्ता के वर्षों के श्रम, निष्ठा और त्याग का सम्मान था जो चुपचाप संगठन की नींव मजबूत करता है।
धामी की राजनीति का मूल तत्व यही है,वे जानते हैं कि चुनाव पोस्टरों से नहीं, कार्यकर्ताओं के पसीने से जीते जाते हैं। बूथ अध्यक्ष कोई बड़ा पद नहीं दिखता, पर लोकतंत्र की असली ताकत वहीं बसती है। जब एक मुख्यमंत्री उस बूथ अध्यक्ष के घर पहुंचकर बेटी के विवाह में परिजन की तरह शामिल होता है, तो वह संदेश देता है कि संगठन में कोई छोटा नहीं है। यह दृश्य कार्यकर्ताओं के मन में वर्षों तक ऊर्जा बनकर रहता है।
यह शैली अचानक नहीं बनती। यह उस व्यक्ति की सोच से आती है जिसने स्वयं संगठन के पायदानों पर चढ़कर सफर तय किया हो। धामी समझते हैं कि कार्यकर्ता केवल नारे लगाने वाली भीड़ नहीं, बल्कि भावनाओं से भरे लोग हैं,जिनके घर भी होते हैं, जिम्मेदारियाँ भी, सपने भी। उनकी चिंता करना केवल राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि एक संस्कार है।
उत्तराखंड की राजनीति में यह एक अलग अध्याय है,जहाँ विकास योजनाओं की समीक्षा के साथ-साथ रिश्तों की भी समीक्षा होती है। एक ओर वे जनता की शिकायतों का समाधान सुनिश्चित करते हैं, दूसरी ओर कार्यकर्ता के घर की खुशियों में शामिल होकर यह भरोसा जगाते हैं कि नेतृत्व दूर नहीं है। यही संतुलन उन्हें “मजबूत” बनाता है,क्योंकि मजबूती केवल फैसलों की कठोरता में नहीं, संबंधों की गहराई में भी होती है।
आज के दौर में जब राजनीति अक्सर छवि प्रबंधन तक सिमट जाती है, धामी की यह पहल बताती है कि जमीनी जुड़ाव अभी भी जीवित है। यह कहानी किसी भाषण की नहीं, बल्कि उस क्षण की है जब सत्ता का सर्वोच्च पद एक साधारण घर की देहरी पर खड़ा था। और शायद यही वह क्षण है जो बताता है,नेतृत्व पद से नहीं, व्यवहार से बड़ा होता है।

Khushi
Author: Khushi

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