
राजकीय दून मेडिकल कॉलेज जैसे संस्थान की साख केवल इमारतों, मशीनों और व्यवस्थाओं से नहीं बनती, बल्कि उन व्यक्तित्वों से बनती है जो जिम्मेदारी को पद नहीं, बल्कि सेवा का अवसर मानते हैं। महेंद्र भण्डारी जी ऐसे ही व्यक्तित्व हैं,जहाँ एक ओर वे पीआरओ के रूप में संस्थान और जनता के बीच संवाद का सेतु बनते हैं, वहीं दूसरी ओर रेडियोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष (HOD) और वरिष्ठ रेडियोलॉजिस्ट के रूप में चिकित्सा सेवा की अग्रिम पंक्ति में खड़े दिखाई देते हैं।
पीआरओ की भूमिका केवल प्रेस नोट जारी करने तक सीमित नहीं होती; यह संवेदनशील परिस्थितियों में संस्थान की विश्वसनीयता बनाए रखने की जिम्मेदारी भी है। किसी भी अस्पताल में जब आपात स्थिति, विवाद, अथवा जनचर्चा का विषय बनती घटनाएँ सामने आती हैं, तब संयमित संवाद, तथ्यों की स्पष्ट प्रस्तुति और मानवीय दृष्टिकोण सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। इस कसौटी पर महेंद्र भण्डारी जी संतुलित, सौम्य और प्रभावी संवाद शैली के कारण अलग पहचान रखते हैं। वे प्रशासन और मीडिया के बीच संतुलन साधते हुए अस्पताल की गरिमा को बनाए रखने का कार्य करते हैं।
दूसरी ओर, रेडियोलॉजी विभाग का नेतृत्व करना अपने आप में अत्यंत जिम्मेदारी भरा दायित्व है। आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था में सटीक निदान (डायग्नोसिस) उपचार की नींव होता है, और यह नींव एक्स-रे, सीटी स्कैन, एमआरआई जैसी जाँचों की शुद्धता पर टिकी होती है। विभागाध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका केवल तकनीकी निर्णयों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी टीम के समन्वय, समयबद्ध रिपोर्टिंग, उपकरणों की कार्यक्षमता और मरीजों के प्रति संवेदनशील व्यवहार सुनिश्चित करने की भी होती है। यह वही क्षेत्र है जहाँ अक्सर दबाव अधिक होता है, लेकिन त्रुटि की गुंजाइश न्यूनतम।
उनकी कार्यशैली का सबसे सशक्त पक्ष है,हर समय उपलब्ध रहने की प्रवृत्ति। सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की सीमाएँ, मरीजों की भारी संख्या और आकस्मिक परिस्थितियाँ सामान्य बात हैं। ऐसे में यदि विभागाध्यक्ष स्वयं सक्रिय रूप से मरीजों की सेवा में संलग्न रहे, तो पूरी टीम का मनोबल स्वतः ऊँचा रहता है। यही नेतृत्व की वास्तविक पहचान है,आदेश देने से अधिक, उदाहरण प्रस्तुत करना।
व्यक्तित्व की दृष्टि से भी वे सौम्यता और दृढ़ता का संतुलित संगम हैं। प्रशासनिक निर्णयों में स्पष्टता, संवाद में विनम्रता और कार्य के प्रति प्रतिबद्धता, ये तीनों गुण उन्हें एक सशक्त चिकित्सक-प्रशासक के रूप में स्थापित करते हैं। चिकित्सा सेवा केवल पेशा नहीं, बल्कि धैर्य, करुणा और निरंतर अध्ययन का क्षेत्र है। एक रेडियोलॉजिस्ट के रूप में उनकी विशेषज्ञता और एक पीआरओ के रूप में उनकी संवाद क्षमता मिलकर उन्हें बहुआयामी बनाती है।
जन्मदिन जैसे अवसर पर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि संस्थान को ऐसे कर्मनिष्ठ अधिकारी पर गर्व होना चाहिए। वे उन चुनिंदा लोगों में हैं जो पर्दे के पीछे रहकर भी व्यवस्था को सुचारु रूप से आगे बढ़ाते हैं। मरीजों की सेवा, संस्थान की गरिमा और समाज के प्रति दायित्व, इन तीनों मोर्चों पर सक्रिय रहना ही उनकी असली पहचान है। ईश्वर उन्हें उत्तम स्वास्थ्य, ऊर्जा और निरंतर सेवा का सामर्थ्य प्रदान करे, ताकि वे आगे भी इसी समर्पण के साथ जनसेवा करते रहें।








