
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देशों के बाद डेंगू पर उत्तराखंड सरकार का “डंक” अब सिर्फ़ कागज़ों तक सीमित नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत बन चुका है। और जब मुख्यमंत्री संकल्प लें, तो कुछ अधिकारी ऐसे होते हैं जो उस संकल्प को मिशन बना लेते हैं—जैसे देहरादून के जिलाधिकारी सविन बंसल।
जब बाकी जिले फाइलों में लार्वा ढूंढ रहे थे, तब देहरादून में डीएम बंसल आशाओं के साथ संवाद कर रहे थे, मोहल्लों में गोष्ठियां तय कर रहे थे और हर घर तक जागरूकता का संदेश पहुंचाने की रूपरेखा बना रहे थे। यह वही सविन बंसल हैं, जिनकी कार्यशैली में व्यवस्था नहीं, संकल्प झलकता है। उन्होंने यह साफ़ कर दिया कि डेंगू को हराना है तो दवाओं से पहले प्रशासनिक सक्रियता की सर्जरी ज़रूरी है।
मुख्यमंत्री धामी ने जितनी दृढ़ता दिखाई, डीएम बंसल ने उसे उतनी ही गंभीरता से धरातल पर उतारा। आशाओं और अर्बन फेसिलेटरों को न केवल जिम्मेदारी दी गई, बल्कि उनके हौसले को 1500 रुपये प्रोत्साहन और 1555 रुपये के पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया। यह इनाम नहीं, एक स्पष्ट संदेश है कि इस लड़ाई में हर योद्धा की कद्र होगी।
अब देहरादून में रैपिड टेस्ट हों या एलिसा टेस्ट, सभी अस्पताल सजग हैं। दून अस्पताल में 1 करोड़ रुपये की लागत से ब्लड सेपरेटर मशीन लगाना सिर्फ़ एक स्वास्थ्य सेवा नहीं, बल्कि यह दर्शाता है कि जिला प्रशासन केवल एम्बुलेंस की सायरन नहीं, व्यवस्था की नब्ज़ भी सुनना जानता है।
जब सरकारी अभियान ‘पैड वर्क’ से ‘फील्ड वर्क’ में बदले, और डीएम फेसबुक पोस्ट से आगे बढ़कर सीधे संवाद करने लगे, तो समझिए कुछ अच्छा हो रहा है। कुछ जिलों में डेंगू पर मीटिंग होती है, देहरादून में मिसन बनता है।
यह व्यंग नहीं, यथार्थ है। जब सरकार और प्रशासन एक सुर में बोलें और कर्मठ अफसर सविन बंसल जैसी सोच लेकर काम करें, तब न केवल मच्छर हारते हैं, बल्कि अव्यवस्था भी भागती है।
उत्तराखंड का यह प्रयास केवल डेंगू के खिलाफ अभियान नहीं, बल्कि सुशासन का एक जीवंत उदाहरण है। और इस उदाहरण के केंद्र में हैं—मा0 मुख्यमंत्री धामी का स्पष्ट नेतृत्व और जिलाधिकारी सविन बंसल की प्रशासनिक दृढ़ता।
अब जब आशाएं घर-घर दस्तक देंगी, तो सिर्फ मच्छर ही नहीं, व्यवस्था में पसरा जड़त्व भी उड़ता नज़र आएगा।
क्योंकि जब अफसर मंशा से नहीं, मिशन से काम करे—तो नतीजे भी बोलते हैं।








