“अचानक धामी से मिलने पहुंचे कांग्रेस के दिग्गज महृषि! पर्दे के पीछे चल रही है सत्ता की सबसे बड़ी पटकथा?”

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देहरादून की शांत और सियासी हवाओं में आज कुछ अलग सरगोशियाँ थीं। मुख्यमंत्री आवास पर हुए एक “शिष्टाचार भेंट” ने राजनीतिक तापमान अचानक बढ़ा दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ रणनीतिकार, मीडिया प्रभारी और संवाद कौशल के माहिर खिलाड़ी राजीव महर्षि जब पूर्व राज्य मंत्री अजय सिंह के साथ मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मिले, तो चाय की चुस्कियों के साथ राजनीति की परतें भी खुलती दिखीं।

अब इसे कोई सामान्य शिष्टाचार भेंट कहे या “राजनीतिक जुगलबंदी” की शुरुआती सीटी—परिस्थिति बता रही है कि मामला इतना साधारण नहीं है। जब कांग्रेस के भीतर असंतोष के बादल मंडरा रहे हों, रणनीति के धुरंधर हाशिये पर डाल दिए जाएं, और नेतृत्व सवालों के घेरे में हो—तो ऐसे में किसी वरिष्ठ नेता का सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री से मिलना केवल मुलाकात नहीं, बल्कि “नज़र का इशारा” भी होता है।

राजीव महर्षि कोई साधारण नेता नहीं हैं। वे संवाद के कलाकार हैं, कैमरे की भाषा जानते हैं और सियासी चालों के बेहद सधे हुए खिलाड़ी हैं। उनका चेहरा मुस्कुराता है, पर उनकी आंखें आने वाली चालें पढ़ लेती हैं। और जब ऐसे व्यक्ति की सीएम धामी जैसे जनसंवादप्रिय नेता से मुलाकात होती है, तो सवाल उठते ही हैं—कहीं यह चाय नहीं, ‘चाणक्य नीति’ तो नहीं?

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की यह खासियत रही है कि वे विरोधियों को भी अपनत्व से गले लगाते हैं। वे सत्ता के शिखर पर होते हुए भी आम कार्यकर्ता जैसा बर्ताव करते हैं—यही गुण उन्हें सियासी खिलाड़ियों के बीच सबसे अलग बनाता है। और जब सामने राजीव महर्षि जैसा नेता हो, तो यह मुलाकात ‘राजनीति 101’ की सबसे दिलचस्प क्लास बन जाती है।

कांग्रेस के लिए यह संकेत काफी है—अगर वह समझना चाहे। ऐसे नेता अगर हाथ छुड़ाने की मुद्रा में दिखें, तो पार्टी के रणनीतिक पंडितों को आत्ममंथन जरूर करना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि कांग्रेस जब तक बैठकर रणनीति बनाए, तब तक उसके रणनीतिकार दूसरी नाव पर चढ़ चुके हों।

ये मुलाकातें अक्सर कैमरे से छुप जाती हैं, पर सियासत में ये मौन मिलन ही सबसे ऊँची आवाज रखते हैं। शायद आने वाले वक्त में कांग्रेस की बैठकों में कुछ कुर्सियाँ खाली रहें और भाजपा के मंचों पर कुछ नई मुस्कानें नजर आएं।

जो भी हो, फिलहाल तो इतना कहा जा सकता है—धामी की सादगी और महर्षि की रणनीति एक फ्रेम में नजर आई है, और यही फ्रेम आने वाले वक्त की बड़ी तस्वीर हो सकता है।

कांग्रेस को अगर अब भी लगता है कि यह “सिर्फ चाय” थी, तो शायद उसे “पत्तियां” पढ़नी नहीं आतीं।

Khushi
Author: Khushi

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