
देहरादून की सड़कों पर अब ट्रैफिक सिग्नल ही नहीं, प्रशासन की मंशा भी चमक रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सोच—”जनसुरक्षा, जनजीवन से सर्वोपरि”—जब ज़मीन पर उतरती है, तो उसका असर सिर्फ सरकारी फाइलों में नहीं, आम जनता के रास्तों में भी नज़र आता है। डीएम सविन बंसल ने इसी सोच को दिशा दी है और देहरादून की सड़क सुरक्षा समिति को कार्रवाई की प्रयोगशाला में बदल दिया है।
चार शराब की दुकानों को हटाने का फैसला सिर्फ प्रशासनिक निर्णय नहीं है, यह उस सोच का प्रमाण है, जहां जनहित अब प्राथमिकता नहीं, अनिवार्यता बन चुका है। जब ट्रैफिक पुलिस ने सनपार्क इन चौक, बिंदाल तिराहा, रोजगार तिराहा और चूना भट्टा जैसे स्थानों पर शराब की दुकानों को दुर्घटनाओं और जाम का कारण बताया, तो डीएम ने एक सप्ताह के भीतर उन्हें शिफ्ट करने का आदेश जारी कर दिया। इस फैसले में कोई दिखावा नहीं, सीधा और सख्त एक्शन है।
बात सिर्फ शराब की दुकानों की नहीं है। सविन बंसल का काम उस डॉक्टर जैसा है जो पहले एक्स-रे करता है, फिर ऑपरेशन। शहर के ट्रैफिक सिस्टम का एक्स-रे हो चुका है—अब ऑपरेशन जारी है। कहीं बिजली के खंभे हट रहे हैं, तो कहीं दुकानों का विस्थापन हो रहा है। पुलिस बूथों की जगह बदल रही है, और जाखन संचार कट से लेकर पुलिया तक सर्विस लेन निर्माण के कामों की मॉनिटरिंग डीएम खुद कर रहे हैं।
ऐसा नहीं कि ये काम पहले नहीं हो सकते थे। फर्क बस इतना है कि अब नीयत भी है, और नेतृत्व भी। जहां दूसरे जिलों में शराब की दुकानें स्थायी इमारत की तरह जमी रहती हैं, वहां देहरादून में ये दुकानों को ‘चलती का नाम गाड़ी’ की तरह चलाया जा रहा है—जनसुरक्षा की दिशा में।
यह सब देखकर एक पुराना सरकारी मज़ाक याद आता है—“सरकारी काम में देर है, अंधेर नहीं।” लेकिन देहरादून की नई प्रशासनिक संस्कृति कह रही है—“अब न देर है, न अंधेर। सीधा ऑर्डर, और तुरंत एक्शन।”
जनता के मन में भरोसा लौट रहा है कि सरकार सिर्फ वोट मांगने नहीं, समाधान देने भी आती है। देहरादून का ट्रैफिक अब सिर्फ वाहन से नहीं, व्यवस्था से भी नियंत्रित हो रहा है। सविन बंसल ने यह सिद्ध कर दिया है कि अगर सोच साफ हो, तो सड़कों पर भी सुधार दिखता है।
और सबसे अच्छी बात यह है कि अब सड़कों पर सिर्फ गाड़ियों का ट्रैफिक नहीं, बल्कि भरोसे का ट्रैफिक भी बढ़ रहा है।








