“डीएम हो तो ऐसा – संवेदनशीलता, तत्परता और जनसेवा की मिसाल”

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सचमुच, कुछ अफसरों की कार्यशैली देखकर यह कहना पड़ता है कि प्रशासन में अब भी उम्मीद की किरण बाकी है। जब किसी दफ्तर में फरियादी पहुंचता है, तो अक्सर उसे लंबी लाइनें, भारी फॉर्मेलिटी और कई दिनों की भाग-दौड़ का सामना करना पड़ता है। लेकिन जब वही फरियादी अपनी समस्या लेकर देहरादून के डीएम सविन बंसल के दरबार में पहुंचे, तो कहानी कुछ और ही लिखी गई—सीधे समाधान की।

एक दिव्यांग महिला, जिसकी हालत शब्दों से परे थी, पेंशन और सहारे की आस लेकर आई थी। न कोई सिफारिश, न कोई जोर-शोर। बस अपनी व्यथा लेकर आई थी। लेकिन डीएम बंसल ने उस समस्या को ऐसे लिया, जैसे वो उनकी अपनी हो। ऑन द स्पॉट पेंशन स्वीकृत, आय प्रमाण पत्र की व्यवस्था, ऑनलाइन आवेदन, व्हीलचेयर की व्यवस्था, और फिर सरकारी “सारथी” गाड़ी से महिला को घर तक सुरक्षित पहुंचाना—सरकारी सिस्टम में ये सब भी संभव है? यही सवाल लोगों के चेहरे पर था।

कहने को तो अफसरों की फौज हर जिले में होती है, पर जनता के साथ ज़मीन पर खड़े होकर, आंखों में आंखें डालकर सहानुभूति के साथ उनकी पीड़ा सुनने वाले अफसर बिरले ही होते हैं। बंसल साहब ने फाइलों की जगह फील्ड को प्राथमिकता दी, कुर्सी से ज़्यादा जन सेवा को अहमियत दी। उनका अंदाज़ बता रहा था कि कुर्सी पर बैठा व्यक्ति नहीं, जनता का सेवक है।

और यह पहली घटना नहीं थी। कभी बहुउद्देशीय शिविर में, तो कभी क्षेत्र भ्रमण में, वो हर जगह उसी ऊर्जा, संवेदनशीलता और ईमानदारी से नजर आते हैं। जनता की समस्या को सिर्फ ‘सुनना’ नहीं, समझना और फिर हल करना उनके काम की पहचान बन चुका है।

ऐसे में जब महिला ने कहा – “डीएम हो तो ऐसा…”, तो वह सिर्फ भावुक प्रतिक्रिया नहीं थी, वह उस सिस्टम पर तंज भी था जिसने आम जनता की समस्याओं को अक्सर फाइलों में उलझा दिया। और यह व्यंग भी था उन अफसरों पर जो कुर्सी पर बैठकर केवल ‘मीटिंग्स’ और ‘निरीक्षण’ की खानापूर्ति करते हैं।

इस एक घटना ने यह साबित कर दिया कि बदलाव का इंतजार करने की बजाय, जब एक सविन बंसल जैसे अधिकारी व्यवस्था को छूते हैं, तो सिस्टम भी मुस्कुराने लगता है।

कहना गलत न होगा—डीएम अगर ऐसा हो, तो जनता फरियादी नहीं, सम्मानित नागरिक महसूस करती है।

Khushi
Author: Khushi

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