“सुप्रीम कोर्ट ने बांके बिहारी मंदिर कॉरिडोर मामले में सुनवाई 29 जुलाई तक के लिए टाली “

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उत्तर प्रदेश सरकार ने वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर के लिए एक ट्रस्ट का गठन किया है, जिसका उद्देश्य मंदिर की व्यवस्थाओं, पूजा-पाठ और सुरक्षा को संभालना है। इस ट्रस्ट में 18 सदस्य होंगे, जिनमें 11 नामित और 7 पदेन सदस्य होंगे। नामित सदस्यों में वैष्णव परंपराओं, संप्रदायों और पीठों से जुड़े प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल होंगे, जबकि पदेन सदस्यों में मथुरा के डीएम, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और अन्य अधिकारी शामिल होंगे।

बांके बिहारी कॉरिडोर की विशेषताएं:

– कॉरिडोर का निर्माण लगभग 5 एकड़ क्षेत्र में किया जाएगा।
– इस पर लगभग 500 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
– कॉरिडोर में श्रद्धालुओं के लिए चौड़ी सड़कें, पार्किंग स्थल, धर्मशालाएं और अस्पताल जैसी सुविधाएं विकसित की जाएंगी।
– कॉरिडोर के निर्माण से श्रद्धालुओं को दर्शन में सुविधा होगी और मंदिर तक पहुंच आसान हो जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:

– सुप्रीम कोर्ट ने 15 मई को उत्तर प्रदेश सरकार को मथुरा-वृंदावन कॉरिडोर विकास के लिए बांके बिहारी जी ट्रस्ट के धन का उपयोग करने की अनुमति दे दी।
– कोर्ट ने कहा कि अधिग्रहित भूमि देवता के नाम पर पंजीकृत होगी।
– सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज (वरिष्ठ डिवीजन) को एक रिसीवर नियुक्त करने का निर्देश दिया है, जिसके पास पर्याप्त प्रशासनिक अनुभव और धार्मिक पृष्ठभूमि हो¹।

अब देखना यह है कि 29 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में क्या निर्णय आता है और इसका बांके बिहारी कॉरिडोर के निर्माण पर क्या प्रभाव पड़ता है।वृंदावन में बांके बिहारी मंदिर कॉरिडोर के निर्माण के लिए मंदिर के फंड का उपयोग करने के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई टाल दी है. यह मामला अब 29 जुलाई को सुना जाएगा. कोर्ट ने इस बात को रिकॉर्ड पर लिया कि यूपी सरकार एक अध्यादेश लाकर मंदिर से जुड़ी व्यवस्था एक ट्रस्ट को सौंप चुकी है. साथ ही, राज्य सरकार से यह भी कहा कि वह लिखित जवाब दाखिल करे.

ध्यान रहे कि कॉरिडोर के निर्माण के लिए मंदिर फंड के 500 करोड़ रुपए के इस्तेमाल का फैसला 15 मई को सुप्रीम कोर्ट ने ही दिया था. कोर्ट ने शर्त रखी थी कि अधिगृहित की हुई जमीन देवता या मंदिर ट्रस्ट के नाम से रजिस्टर्ड की जाए. मंदिर के एक सेवायत ने याचिका दायर कर कहा था कि मामले में उसका पक्ष नहीं सुना गया. उत्तर प्रदेश सरकार ने इस याचिका का खड़ा विरोध किया.

राज्य सरकार के लिए पेश वकील ने जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच को बताया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद वह एक अध्यादेश लाई है. इस अध्यादेश के जरिए मंदिर से जुड़े मामले एक ट्रस्ट को सौंप दिए गए. राज्य सरकार खुद मंदिर के फंड का इस्तेमाल नहीं करेगी इसलिए, अब इस तरह की याचिका निरर्थक है.

बेंच की अध्यक्षता कर रहीं जस्टिस नागरत्ना ने इस बात पर सवाल उठाए कि मंदिर के सेवायतों के निजी विवाद में राज्य सरकार कैसे पार्टी बन गई. जस्टिस नागरत्ना का कहना था कि राज्य सरकार के दखल के बाद ही उसे मंदिर के फंड का इस्तेमाल करने की अनुमति मिली, लेकिन बेंच के दूसरे सदस्य जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने कहा कि मामले में फैसला दिया जा चुका है. अगर कोई सहमत न हो तो पुनर्विचार याचिका दाखिल करे. इस तरह कोई आवेदन दाखिल कर फैसले को नहीं बदलवाया जा सकता.

जस्टिस शर्मा की बात से जस्टिस नागरत्ना ने भी सहमति जताई. उत्तर प्रदेश सरकार के वकील ने कहा कि सरकार ने जो ट्रस्ट बनाया है, उसमें मंदिर के सेवायतों को जगह दी गई है. कॉरिडोर बनाने के लिए फंड का इस्तेमाल ट्रस्ट ही करेगा. इसके बाद कोर्ट ने सुनवाई टाल दी. याचिकाकर्ता ने अंतरिम रोक की मांग रखी, लेकिन कोर्ट ने ऐसा आदेश नहीं दिया.

Khushi
Author: Khushi

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