
जब किसी जिले का डीएम सिर्फ कुर्सी नहीं, बल्कि एक सोच बन जाए — तो नतीजे “नंदा-सुनंदा” जैसे प्रोजेक्ट के रूप में सामने आते हैं। यह कोई आम योजना नहीं, बल्कि उन बेटियों के टूटते सपनों में फिर से रंग भरने की कोशिश है, जिन्हें हालात ने समय से पहले बड़ा बना दिया।
जरा सोचिए, जब अधिकांश अधिकारी फाइलों में उलझे रहते हैं, तब सविन बंसल बेटियों की स्कूल-कॉलेज की फीस के लिए चेक थमाते नज़र आते हैं। एक ओर सिस्टम है, जो अक्सर paperwork में सिसकियाँ लेता है, और दूसरी ओर यह अधिकारी, जो हर असहाय बेटी में एक सशक्त स्त्री की संभावनाएं तलाशता है।
12 लाख रुपये की राशि सुनने में बड़ी नहीं लगती, मगर जब ये राशि 38 बेटियों की ज़िंदगी बदल दे, तो इसका मूल्य करोड़ों में आंका जाना चाहिए। यह वो निवेश है, जो भविष्य के डॉक्टर, शिक्षक, वैज्ञानिक और प्रशासनिक अधिकारी तैयार करेगा — वो भी उन घरों से, जहां आज भी छत की जगह आसमान है और उम्मीद की जगह चिंता।
बिन माता-पिता की अभिलाषा, विधवा मां की बेटियां विशाखा, अक्षिता, पीहू — ये सब अब सिर्फ नाम नहीं, बल्कि नंदा-सुनंदा की जीवित प्रतिमाएं हैं। अगर DM चाहें तो बदलाव सिर्फ नीति पत्रों में नहीं, ज़मीन पर भी दर्ज हो सकते हैं। सवाल ये नहीं कि क्यों किया, असली सवाल ये है कि इतने सालों में बाकी जिलों के डीएम क्या कर रहे थे?
इस प्रोजेक्ट का नाम भी प्रतीकात्मक है — “नंदा-सुनंदा”, देवभूमि की उन देवीस्वरूप बेटियों का प्रतीक, जो विपरीत परिस्थितियों में भी मुस्कान लिए भविष्य की ओर देख रही हैं। यह सिर्फ शिक्षा नहीं, आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना है। यह बताता है कि सरकार की योजनाएं तब ही कारगर होती हैं जब जमीनी स्तर पर उन्हें एक संवेदनशील नेतृत्व मिलता है।
इस ब्लॉग को पढ़ने वाले बाकी अधिकारी यदि अब भी सिर्फ औपचारिकता निभा रहे हैं, तो शायद उन्हें “प्रेरणा” शब्द का सही अर्थ सविन बंसल से सीखना चाहिए। क्योंकि फाइलों में कैद बेटियां अब पंख फैला रही हैं — और ये उड़ान सविन बंसल जैसे अफसरों की कलम और करुणा के कारण संभव हुई है।
तो अगली बार जब कोई डीएम मीटिंग में व्यस्त दिखे, तो पूछिए — “आपने अपने जिले की कितनी ‘नंदा-सुनंदा’ को फिर से किताब थमाई?” क्योंकि साहब, पद की शान टाई और टेबल से नहीं, जमीनी काम से बनती है।








