गोलीकांड में दबिश देने गई पुलिस को मिला इनाम – किसके इशारे पर हुए दो दरोगा लाइनहाज़िर, अपराधियों को खुला संरक्षण!

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देवबंद की हवाओं में इन दिनों बारूद की बू है। एक गांव, लखनौती, जहां दिनदहाड़े 40 से 50 राउंड गोलियां चलती हैं, और पुलिस जब उन अपराधियों की तलाश में दबिश देती है, तो खुद पुलिस ही कठघरे में खड़ी कर दी जाती है। दो दरोगा लाइन हाजिर कर दिए गए, मानो अपराधियों के घर में घुसकर कोई गुनाह कर बैठे हों। खाकी का मनोबल तोड़ने की ये नई परंपरा शायद कानून के राज की आखिरी सांसों का ऐलान है।

जिस खादी को जनता ने पहनाया था सत्ता का ताज, अब वही खादी खाकी की गर्दन पर सत्ताधारी जूते की तरह लटक रही है। देवबंद में इस बार सवाल सिर्फ यह नहीं है कि गोली चलाने वाले कौन थे, सवाल यह भी है कि उन्हें बचाने वाला कौन है? कौन है जो बंदूकधारियों के पीछे खड़ा है, और कौन है जो पुलिसकर्मियों को सस्पेंड करवाकर उनको इनाम दे रहा है?

गांव में आज भी सन्नाटा है, खेतों में हल नहीं चल रहे, बच्चों के स्कूल जाने की हिम्मत नहीं हो रही। लेकिन कुछ चेहरों पर मुस्कान जरूर है—वो चेहरें जो सत्ता के गलियारों में गूंजती फोन कॉल्स से दबिश रुकवा सकते हैं, और जिनके इशारे पर वर्दीधारियों को लाइन में लगा दिया जाता है।

ग्रामीण आज एसएसपी कार्यालय की ओर रवाना हैं, उम्मीद के साथ कि शायद वहां कोई सुनवाई हो। लेकिन लखनऊ की ओर भी संदेश गया है—मुख्यमंत्री से न्याय की गुहार। सवाल सीधा है, और जवाब टेढ़ा—क्या अब देवबंद में उत्तर प्रदेश सरकार का राज नहीं रहा?

इस पूरे घटनाक्रम में एक माननीय का नाम नहीं लिया जा रहा, लेकिन हर कोई जानता है कि तीर किस दिशा में छोड़ा गया है। खामोशियां भी चीख रही हैं कि राजनीति अब सुरक्षा नहीं, संरक्षण की परिभाषा बन चुकी है।

देवबंद में कानून की चिता जल रही है, और कोई खादीधारी उस अग्नि को हवा दे रहा है। पुलिसकर्मी सिर्फ गोली खाने या लाइन हाजिर होने के लिए रह गए हैं। अपराधियों की हिम्मत, नेताओं का संरक्षण और खाकी की बेबसी—यह त्रिकोण अब देवबंद की नई पहचान बनता जा रहा है।

तो क्या अब गोलियों की आवाज ही इंसाफ की भाषा होगी?

या फिर लखनऊ की सत्ता इस बार वाकई कुछ सुनने को तैयार है?

बोलती बंदूकें, चुप सत्ता, और सज़ा उनपर जो सच्चाई से टकराएं—देवबंद की ये दास्तां अब उत्तर प्रदेश की कहानी बनती जा रही है।

Khushi
Author: Khushi

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