“भावी पीढ़ी के लिए उत्तराखंड की लोकभाषाओं और संस्कृति का संरक्षण”

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उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सचिवालय में आयोजित उत्तराखंड भाषा संस्थान की बैठक में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं। इन निर्णयों का उद्देश्य राज्य की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित और प्रोत्साहित करना है।

मुख्य निर्णय:
लोकभाषाओं का डिजिटलीकरण*: गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी भाषाओं की लोककथाएं, लोकगीत, कहावतें और साहित्य को डिजिटल रूप में संरक्षित करने के निर्देश दिए गए हैं।
– पडों के रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण*: पंडों के रिकॉर्ड, जिनमें कई पीढ़ियों का विवरण होता है, को डिजिटलाइज करने का निर्णय लिया गया है।
– क्षेत्रीय बोलियों को बढ़ावा देने के लिए मोबाइल ऐप और पॉडकास्ट*: अधिकारियों को क्षेत्रीय बोलियों को बढ़ावा देने के लिए मोबाइल ऐप, पॉडकास्ट और ई-लर्निंग कोर्स शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं।
– *लोकगायकों और गाथाकारों का डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन*: लोकगायकों और गाथाकारों का डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन तैयार करने का निर्णय लिया गया है।
– *स्थानीय बोली और संस्कृति अध्ययन केंद्रों की स्थापना*: प्रदेश के विश्वविद्यालयों में स्थानीय बोली और संस्कृति अध्ययन केंद्रों की स्थापना को प्रोत्साहित किया जाएगा।
– *चित्रकथाएं और वीडियो बुक्स का विकास: गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी में चित्रकथाएं और वीडियो बुक्स विकसित करने का निर्णय लिया गया है ताकि भावी पीढ़ी अपनी लोकभाषाओं से जुड़ सके।
लक्ष्य:
सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण: उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को सहेजते हुए डिजिटल युग में नई ऊंचाइयों तक पहुंचाना।
लोकभाषाओं का प्रोत्साहन: लोकभाषाओं को बढ़ावा देने और उन्हें भावी पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए विभिन्न पहलों को लागू करना।
इन पहलों के माध्यम से उत्तराखंड सरकार राज्य की सांस्कृतिक पहचान और अस्मिता को मजबूत करने का प्रयास कर रही है।

Khushi
Author: Khushi

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