देहरादून से MSME क्रांति की शुरुआत, अर्चित डावर बने IIA के नए अध्यक्ष – उद्योगों को मिला नई सोच वाला नेतृत्व

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जब किसी शहर की पहचान केवल सुंदर वादियों और शांत आबोहवा से हो, तो उद्योगों के लिए वो शहर अक्सर बैक बेंच पर बैठा दिखता है। देहरादून भी लंबे समय से इसी किस्म की उदासी से जूझ रहा था—जहां संस्थाएं थीं, लेकिन संवेदना नहीं; नीति थी, लेकिन नीयत नहीं; और आयोजन होते थे, लेकिन उद्योगों की ज़मीन पर कुछ नहीं बदलता था। पर 28 जून 2025 को भारतीय उद्योग संघ (IIA) का वार्षिक सत्र जैसे इस ठहरे पानी में एक अच्छी लहर फेंक गया।

औराडून वेन्यू में भव्यता से सजे मंच पर उप श्रमायुक्त से लेकर जिला उद्योग केंद्र के अधिकारी और नामी उद्योगपति मौजूद थे। कार्यक्रम की चमक तो थी ही, लेकिन इस बार माहौल में एक बात अलग थी—इस बार “कागजों में प्रगति” नहीं, “ज़मीन पर दिशा” की बात हुई। और इसका सबसे बड़ा कारण था IIA देहरादून चैप्टर के नए अध्यक्ष के रूप में अर्चित डावर की ताजपोशी।

अब आप सोच रहे होंगे—एक और अध्यक्ष, बड़ी बात क्या है? पर साहब, यहां बात सिर्फ पद की नहीं, सोच की है। अर्चित डावर वो नाम है जो देहरादून की उद्योगिक जमावट में “प्रोटोकॉल नहीं, प्रैक्टिकल अप्रोच” लेकर आया है। जब नेतृत्व युवा होता है, तो वह पुराने ढर्रे पर चलने के बजाय पटरियाँ बिछाता है। और यही वो उम्मीद है जिसे देहरादून के MSME सेक्टर ने वर्षों से संजो कर रखा था—बोलने वाला नहीं, सुनने वाला नेतृत्व

पूर्व अध्यक्ष श्री पुनीत वधवा ने जो उपलब्धियाँ गिनाईं, वो सिर्फ सलामी के लायक नहीं थीं, बल्कि एक संदेश थीं कि अगर सोच साफ हो, तो सीमित संसाधनों से भी उद्योगों को नई ऊंचाई दी जा सकती है। पर शायद अब वक्त है उस सोच को और आगे ले जाने का—PowerPoint प्रेजेंटेशन से निकलकर पॉवरफुल प्रैक्टिकल रिजल्ट तक।

नई कार्यकारिणी में जिन नामों की घोषणा हुई, उनमें अनुभव और ऊर्जा का सही मिश्रण दिखा—पर असली सवाल ये है कि क्या यह टीम ‘सिर्फ काम की बात’ करेगी या ‘काम करके बात बनाएगी’? देहरादून का उद्यमी समाज अब “आपका सुझाव हमारे लिए महत्वपूर्ण है” जैसे घिसे-पिटे संवादों से थक चुका है। अब ज़रूरत है कि उसे सिर्फ सुझाव देने वाला संगठन नहीं, संकट में साथ खड़ा रहने वाला साथी मिले।

कार्यक्रम में जब मंच से ये घोषणा हुई कि हम MSME को सशक्त बनाएंगे, तो कुछ उद्यमियों की आंखों में वही पुरानी मुस्कान दिखी—“पहले भी कई बार सुना है।” लेकिन अब उम्मीद है कि अर्चित डावर इस पर सिर्फ स्लोगन नहीं बनाएंगे, बल्कि सिस्टम बनाएंगे—जो नीतियों को फाइलों से निकालकर फैक्ट्रियों तक पहुँचाएगा।

तंज भी जरूरी है, क्योंकि तारीफ बिना कटाक्ष के अधूरी होती है। देहरादून के कुछ उद्योग आज भी उसी हालत में हैं जैसे पुराने स्कूलों में बच्चों की लाइब्रेरी—नाम भर की मौजूदगी, लेकिन न उपयोग, न सुधार। ऐसे में IIA का ये सत्र अगर एक और फोटो सेशन बनकर रह गया, तो अफसोस की बात होगी। लेकिन अगर यही सत्र देहरादून को “उद्योगों की राजधानी” बनाने की ओर पहला कदम बना, तो इतिहास में दर्ज हो सकता है।

अब देखना ये है कि नई टीम नीतियों की लैपटॉप स्लाइड्स से आगे बढ़ती है या नहीं। क्योंकि साहब, उद्योग सिर्फ Excel शीट में नहीं चलते—उन्हें बिजली, ज़मीन, सुरक्षा और भरोसा चाहिए। और ये सब तभी मिलेगा जब नेतृत्व में सिर्फ चमक नहीं, चलने की जिद भी हो।

देहरादून को अब ‘खूबसूरत शहर’ से ‘उद्यमशील शहर’ बनने की ओर कदम बढ़ाने हैं। IIA की यह टीम उस रास्ते की शुरुआत है। अगर अर्चित डावर और उनके साथियों ने नीयत, नीति और निष्पादन—इन तीन स्तंभों पर ईमानदारी से काम किया, तो अगली बार हमें उद्योगों की चर्चा किसी सम्मेलन में नहीं, एक्सपोर्ट चार्ट्स में देखने को मिलेगी।

बस उम्मीद यही है कि ये बदलाव भाषणों की ऊंचाई तक नहीं रुके… ज़मीन पर गूंजे।

Khushi
Author: Khushi

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