
सहारनपुर में आबकारी विभाग का एक और “शुद्ध” चेहरा बेनकाब हो गया है। इंस्पेक्टर शैलेंद्र कुमार, जिन्हें कानून का रक्षक होना चाहिए था, वही कानून की जेब में हाथ डालते पकड़े गए। 25 हज़ार की रिश्वत लेते हुए एंटी करप्शन टीम ने उन्हें अंबेडकर चौक स्थित आबकारी कार्यालय से रंगे हाथों दबोच लिया।
शिकायतकर्ता सुशील कुमार FD की रकम वापसी के लिए महीनों से चक्कर काट रहा था, लेकिन इंस्पेक्टर साहब की जेब गरम किए बिना रकम मिलने का कोई रास्ता नहीं था। अब सवाल ये है — आम जनता से लेकर ठेका संचालकों तक, ऐसे अफसरों की कितनी ‘वसूली लिस्ट’ होती होगी?
जनता का पैसा, जनता का हक, और अफसरशाही की जेब। हर जिले में बैठा एक “शैलेंद्र कुमार”, जो सुविधा शुल्क की भाषा में ही फाइलें खोलता है।
एंटी करप्शन की कार्रवाई काबिल-ए-तारीफ है, लेकिन यह एक अकेला मामला नहीं है — यह उस सड़े सिस्टम की एक परत है, जहां शिकायत करने वाला ‘गुनहगार’ और रिश्वत मांगने वाला ‘साहब’ बना बैठा है।
जनता का सवाल:
क्या हर विभाग में एक एंटी करप्शन टीम बैठानी होगी?
या फिर विभाग के भीतर ही ईमानदारी की चौकी बनानी पड़ेगी?
और सबसे अहम —
आबकारी विभाग में ठेकेदारों पर जो रोज़ का रौब झाड़ा जाता है, वो किस कीमत पर होता है?
शायद अगली गिरफ़्तारी कोई ठेका संचालक करवा दे!








