12वीं फेल लौंडा बना सचिवालय का दलाल: सत्ता के धुर विरोधी बड़े नेताओं की गोद में बैठकर पत्रकारिता का मज़ाक उड़ाता फर्जी रिपोर्टर!

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उत्तराखंड का सचिवालय, जहां कभी मुख्यमंत्री की मेज़ पर राज्य का भविष्य लिखा जाता था, आज कुछ अजीब किस्म की हलचलों का केंद्र बन चुका है। वहां एक 12वीं फेल लड़का फाइलें पकड़कर बैठा है। खुद को पत्रकार कहता है। पत्रकार… यानी वो जो सत्ता से सवाल करता है। लेकिन यह लड़का सवाल नहीं करता, सेटिंग करता है। यह पत्रकार नहीं, दलाल है। वह भी ऐसा दलाल, जो नेताओं के तलवे चाटने की कला में मास्टर डिग्री हासिल कर चुका है, भले इंटर पास न कर पाया हो।

कल तक यह लड़का पान की दुकान पर खड़ा होकर दुनिया की सबसे बड़ी बहस करता था – “सरकार कुछ नहीं कर रही।” आज वही लड़का सरकार के बगल में बैठा है और पूछ रहा है – “सर, अगली फाइल किसकी लगाऊं?” इसने पत्रकारिता को गले नहीं लगाया, उसका गला घोंटा है। यह उसी तरह का पत्रकार है जैसे फुटपाथ पर बिकने वाला ‘ओरिजनल’ iPhone।

इसे न कोई पत्रकारिता का प्रशिक्षण मिला, न किसी खबर की समझ। इसे सिर्फ जुबान चलानी आती है और जुगाड़ भिड़ाना। किसी अखबार में टिक नहीं सका, किसी न्यूज़ चैनल ने इसे लायक नहीं समझा। लेकिन आज सचिवालय में अफसरों के चेंबर में बैठकर यह खुद को ‘बड़ा पत्रकार’ बताता है। हकीकत यह है कि ये पत्रकारिता नहीं कर रहा, दलाली कर रहा है।

अब इसका नया हुनर देखिए – ये दो धुर विरोधी नेताओं की “संयुक्त संपत्ति” बन चुका है। आज एक के दफ्तर में बैठा होता है, मीठी-मीठी बातें करता है। कल उसके विरोधी के साथ फोटो खिंचवा रहा होता है। इसकी विचारधारा वहीं झुकती है जहां से नोटों की गंध आती है। इसे ना उत्तराखंड से मतलब है, ना लोकतंत्र से – इसे मतलब है सिर्फ सेटिंग और सफेद लिफाफों से।

कभी जेब में चाय पीने तक के पैसे नहीं थे, अब सफारी सूट पहनकर सरकारी गाड़ियों में घूमता है। टूटी चप्पल पहनने वाला लौंडा आज फैसलों में दखल दे रहा है। जब असली पत्रकार सड़क पर संघर्ष कर रहे हैं, तब ये सचिवालय में बैठकर मलाई खा रहा है। जिसे पत्रकार बनने की न्यूनतम योग्यता नहीं मिली, वो अब व्यवस्था का सबसे बड़ा ठेकेदार बना घूम रहा है।

उत्तराखंड की पत्रकारिता अब मिशन नहीं रही, यह कमीशन बन चुकी है। सवाल पूछने की जगह सेटिंग हो रही है। तथ्य की जगह तसल्ली बेची जा रही है। और जब ऐसे फर्जी पत्रकार लोकतंत्र की छाती पर बैठ जाएं, तो असली पत्रकारों के लिए जगह ही नहीं बचती।

अब जनता को तय करना है – क्या यही पत्रकारिता है? क्या यही वह चौथा खंभा है, जिसे संविधान ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए खड़ा किया था? अगर ऐसे लोग सत्ता की गोद में बैठकर खुद को पत्रकार कहेंगे, तो कल हर गली से कोई समोसे वाला या चाय बेचने वाला आएगा और बोलेगा – “मैं भी पत्रकार हूं।”

मुख्यमंत्री जी, ये सवाल अब आपसे है। क्या आप देख नहीं रहे कि सचिवालय में फर्जी पत्रकारों का जमावड़ा है? क्या आप अब भी चुप रहेंगे जब एक इंटर फेल लौंडा फैसलों को प्रभावित कर रहा है? ये सिर्फ पत्रकारिता नहीं, पूरी व्यवस्था की हत्या है। अब सफाई ज़रूरी है। नहीं तो कल को जनता भी पूछेगी – “साहब, ये पत्रकार है… या दलाल?”

Khushi
Author: Khushi

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