“बच्चों के स्वस्थ भविष्य की रसोई: देहरादून डीएम ने दो हफ्ते में निभाया कमिटमेंट, 89 लाख से बदलेगा स्कूलों का मिड-डे मील सिस्टम”

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देहरादून ज़िले के स्कूलों में “किचन विहीनता” जैसे शब्द अब शायद बीते ज़माने की बात होने वाली है — कम से कम प्रेस नोट को पढ़कर तो यही लगता है। जिलाधिकारी सविन बंसल ने जिस तत्परता से दो हफ्तों में वादा पूरा कर दिखाया, वो अब खुद एक “सरकारी कीर्तिमान” बन चुका है। कमिटमेंट शब्द सुनते ही आम आदमी को जहां नेताओं की भाषणबाज़ी याद आती है, वहीं डीएम साहब ने उसे “बजट रिलीज” से जोड़कर असल में कर दिखाया — और वो भी भोजन माताओं और स्कूली बच्चों के स्वास्थ्य के नाम पर।

कभी जिस किचन में चूल्हे नहीं थे, वहां अब स्टोररूम समेत निर्माण की तैयारी है, और वो भी जिला योजना विशेष फंड से — मतलब अब किसी नेता के मन की योजना नहीं, बल्कि सीएम की प्रेरणा और डीएम की प्राथमिकता की योजना। 89 लाख की रकम ऐसे पेश की गई है जैसे बच्चों के लिए कोई “मिशन मिड-डे भोजन” का नया पार्ट शुरू हो रहा हो। ऊपर से निर्देश भी इतने सख्त हैं कि मानो एल्यूमिनियम के बर्तन देखकर खुद डीएम की तबीयत बिगड़ जाती हो।

स्कूलों में अब खाना एल्यूमिनियम में नहीं दिखना चाहिए — ये निर्देश नहीं, इमोशनल अपील जैसी लगती है। स्टील के बर्तन में खाना पकाकर जब कोई बच्चा मुस्कुरा कर बोलेगा “अच्छा बना है,” तो शायद ये योजना की सबसे बड़ी सफलता होगी। और हां, राज्य में पहली बार भोजन माता की “सहायक” महिला तैनात हो रही है — वो भी लोकल। ये सरकारी भोजन नहीं, महिला सशक्तिकरण का नया फ्लेवर है।

2118 भोजन माताओं में अब 50 सहायक महिलाएं जुड़ेंगी — यानी एक नई रोजगार श्रृंखला। अब सरकारी योजना सिर्फ खाना नहीं दे रही, रोज़गार भी पका रही है। इतना ही नहीं, 695 जर्जर किचनों की मरम्मत भी प्लान में आ गई — अब शायद स्कूलों के किचन भी “बॉडी पॉजिटिव” महसूस करें। जो किचन अब तक टूटे पड़े थे, वे भी शायद आने वाले समय में सेल्फी स्पॉट बन जाएं: “पहले की हालत – अब की हालत” स्टाइल में।

सबसे खास बात ये है कि यह सब तब हुआ जब समीक्षा बैठक में एक डीएम ने अपनी कुर्सी को कार्यवाही में बदल दिया। जिलाधिकारी का कहना है कि बच्चों और भोजन माताओं का स्वस्थ रहना प्रशासन की जिम्मेदारी है — ये सुनकर लगता है जैसे अब सरकारी फाइलों में संवेदनाएं भी जुड़ने लगी हैं।

तो इस बार जब कोई स्कूल का बच्चा मिड-डे मील खाएगा, और एक लोकल महिला उसकी प्लेट में सब्ज़ी परोसेगी, तो वो सिर्फ एक भोजन नहीं होगा — वो उस भरोसे का स्वाद होगा जो एक डीएम ने किचन के रास्ते पहुंचाया है।

चलो, कम से कम कहीं तो “बजट” सच में बच्चों की थाली तक पहुंचा है — और स्टील की थाली में।

Khushi
Author: Khushi

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