
रायफल क्लब—सुनते ही लगता है मानो कोई शौक़ीन वर्ग की निजी व्यवस्था हो, जहां लक्ष्य साधने की बात होती है, मगर इस बार देहरादून में इस ‘लग्जरी ट्रांजैक्शन’ को जिलाधिकारी सविन बंसल ने जरूरतमंदों की ‘लाइफ ट्रांजैक्शन’ बना दिया। असल में ये महज आर्थिक सहायता नहीं, सिस्टम की सूझबूझ और मानवीयता की मिसाल है।
जहां एक ओर आमतौर पर सरकारी फंड ‘ब्यूरोक्रेटिक नींद’ में सोते रहते हैं, वहीं रायफल क्लब फंड जैसे एक ‘कम चर्चा वाला कोना’ जिलाधिकारी की पहल से उन लोगों के लिए जीवनरेखा बन गया जिनकी जिंदगी किसी रायफल की गोली की तरह चुपचाप बेआवाज हो गई थी।
ये कोई चुनावी वादा नहीं था, न ही कोई बड़ी सरकारी योजना का शोर… बल्कि एक सधा हुआ फैसला था—कि अब शस्त्र लाइसेंस की फाइलें सिर्फ दस्तावेज़ नहीं, बल्कि किसी विधवा के बच्चे की स्कूल फीस बनेंगी, किसी लकवाग्रस्त महिला का घर तक लौटने का माध्यम बनेंगी, या किसी टूटे परिवार के लिए रोज़गार की शुरुआत।
और इसमें तंज ये है कि जिस फंड का जन्म हुआ था ‘शस्त्र प्रेमियों’ के नाम पर, वो अब ‘शस्त्रहीन’ जिंदगी की ढाल बन गया। ये तो जैसे रायफल क्लब का असली ‘ट्रिगर’ अब सेवा भावना हो गया है।
सविन बंसल ने जिस ढंग से रायफल क्लब फंड को CSR (कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) की तर्ज़ पर आमजन के लिए इस्तेमाल किया है, वो न केवल प्रशासनिक नवाचार का उदाहरण है, बल्कि एक कड़ा सवाल भी—कि बाकी जिलों में ऐसे ‘क्लब’ और फंड किस ‘निशाने’ पर हैं?
आज जब प्रशासनिक अधिकारी अक्सर ‘फाइलों में उलझे रहते हैं’, तब डीएम बंसल की ये सीधी, सशक्त, और संजीदा पहल बताती है कि कलम और सत्ता दोनों जब इंसानियत की ओर झुकें, तो ब्यूरोक्रेसी भी सहारा बन सकती है।
यह भी काबिले-गौर है कि 20 साल बाद इस फंड का वास्तविक जनहित में उपयोग हुआ। पहले शस्त्र लाइसेंस का यह ‘फैशन टैक्स’ जैसे एक औपचारिकता भर था, आज यह जरूरतमंद की जेब में उम्मीद बनकर पहुंचा है।
कुल मिलाकर, डीएम बंसल की ये पहल एक उदाहरण है कि प्रशासन अगर चाहे, तो वो रायफल से गोली नहीं, बल्कि उम्मीदें चला सकता है।
अब देखना ये है कि क्या यह मिसाल किसी और जिले की नींद तोड़ पाएगी, या फिर बाकी जिले अब भी रायफल क्लब को केवल ‘मेम्बरशिप कार्ड’ ही समझते रहेंगे?








