साखन खुर्द में दीपक त्यागी ने शुरू की प्रधान पद की तैयारी, पिता हरिभूषण त्यागी के संकल्प को बना रहे मार्गदर्शन

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दीपक त्यागी,साखन खुर्द

इस बार गांव की फिज़ा कुछ अलग है। हवा में कोई शोर नहीं, लेकिन दिलों में एक नाम गूंज रहा है – दीपक त्यागी। न ढोल-नगाड़ा, न नारेबाज़ी, बस एक सधा हुआ भरोसा, जो गांव की गलियों में कानों-कानों फैल रहा है।

दीपक त्यागी इस बार ग्राम पंचायत का चुनाव लड़ने जा रहे हैं – ये खबर नहीं, बल्कि उम्मीद की तरह फैली है। कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो चुनाव की घोषणा से पहले ही लोगों के मन में वोट पा लेते हैं। दीपक उन्हीं में से हैं।

गांव की राजनीति में जहां कुछ लोग “कुर्सी के लायक” बनने की कोशिश में रिश्ते बिगाड़ लेते हैं, वहीं दीपक त्यागी पहले ही “मन का प्रधान” बन चुके हैं। राजनीति उनके लिए कोई अवसर नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व है – और शायद यही फर्क उन्हें खास बनाता है।

पिता हरी भूषण त्यागी का नाम गांव में आज भी आदर से लिया जाता है। उन्होंने गांव को सिर्फ प्रधान की कुर्सी से नहीं, एक मार्गदर्शक की तरह दिशा दी। अब वही सोच दीपक में दिखती है – विनम्रता, व्यवहार और विकास की चाह।

गांव की मिट्टी से जुड़े हैं दीपक, और ये जुड़ाव दिखावे से नहीं, भाव से है। जबकि बाकी प्रत्याशी अपने चेहरे बैनरों पर चिपकाकर पहचान ढूंढ रहे हैं, दीपक त्यागी गांव की हर देहरी पर पहले से जाने-पहचाने जाते हैं।

वो ना वादा करते हैं, ना हवा में सपने बेचते हैं। वो बस इतना कहते हैं – जो किया है, वही कहूंगा; जो कहूंगा, वही करूंगा। राजनीति के इस दौर में जहां “झूठे वादे” ही सबसे बड़ा चुनावी घोषणा पत्र बनते जा रहे हैं, दीपक त्यागी की सादगी ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।

कुछ लोग चुनाव में उतरते हैं ताकत दिखाने, दीपक उतर रहे हैं सेवा निभाने। बाकी लोग चुनाव लड़ते हैं – दीपक त्यागी तो गांव के साथ चल रहे हैं।

गांव का माहौल कहता है – इस बार कोई नया चेहरा नहीं चाहिए, कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं, सिर्फ वही चाहिए जो गांव की धड़कनों को समझता हो। और शायद यही कारण है कि दीपक त्यागी के नाम के आगे अब सिर्फ “उम्मीदवार” नहीं, “विश्वास” जुड़ गया है।

Khushi
Author: Khushi

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