
जब आदित्य का उजाला खुद के घर में ही धुंधला पड़ जाए, तो दूर तक रोशनी फैलाने के दावे बस खोखली गूंज बनकर रह जाते हैं।
कर्ज की परछाईं इतनी गहरी हो कि बैंक के दरवाज़े पर कदम भारी पड़ जाएं, फिर भी मंच पर खड़े होकर नयी सुबह की बातें करना – यही असली अभिनय है।
सत्ता की सीढ़ियों पर चढ़ते-चढ़ते अब सीढ़ियां ही हिलाने का हुनर आ गया है।
मुखौटे के पीछे मुस्कान, और पीछे से अपने ही आंगन में दरार डालने का सिलसिला – यह राजनीति का नया नज़ारा है।
अपनी खास टोली के सहारे जगह-जगह चिंगारी फेंकना और फिर तमाशा दूर से देखना, मानो जिम्मेदारी का अर्थ ही बदल गया हो।
आदित्य चाहे कितना भी तेज चमके, अगर उसकी गर्मी अपने ही घर को झुलसा दे, तो उजाला भी बदनामी में बदल जाता है।








