“सवीन बंसल नाम तो सुना ही होगा – जनता दरबार को बना दिया न्याय का दरबार”

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जल संकट पर प्रशासन सख्त, हर दिन हर घर तक पानी पहुंचाना लक्ष्य
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बहुत से आईएएस अधिकारी आते हैं और चले जाते हैं, नाम तक याद नहीं रहते। कुछ कुर्सी पर बैठते ही खुद को भगवान समझने लगते हैं, और कुछ ऐसे होते हैं जो जनता से दूरी बनाकर सिर्फ फाइलों में दफन रहते हैं। पर देहरादून में सवीन बंसल का दौर थोड़ा अलग रहा। मैं उनसे सिर्फ चार-पाँच बार मिला हूँ, वो भी खबरों के सिलसिले में, लेकिन हर बार यही लगा कि यह आदमी बाकी अफसरों की तरह “कुर्सी का गुलाम” नहीं है।

अजीब बात है—जब नेताओं का काम न हो तो अधिकारी पर ताने कसते हैं, पत्रकार का काम न हो तो वही अधिकारी चोर-उचक्का लगने लगता है। यह बीमारी हर जगह है। लेकिन सवीन बंसल पर चाहे जितना भी आरोप लगाओ, हकीकत यही है कि देहरादून में उन्होंने प्रशासन को “ऑफिस” से निकालकर “जनता दरबार” तक पहुँचा दिया। गरीब हो या असहाय, मजबूर हो या शोषित—हर किसी को अपनी बारी पर न्याय मिला।

वो आत्मसम्मान से समझौता न करने वाले अफसर हैं। यह गुण अक्सर नेताओं और पत्रकारों को खटकता है, क्योंकि उन्हें वही अधिकारी भाता है जो “जी हजूर” करने में माहिर हो। समय के पाबंद हैं, काम के लिए सख्त हैं, और योजनाओं को ज़मीन तक पहुँचाने का उनका तरीका बाकी जिलाधिकारियों को आईना दिखाता है।

तंज यह है कि हमारे सिस्टम में ऐसे अफसर कम ही बचते हैं। बाकी तो या तो नेताओं की जेब में होते हैं या मीडिया की कलम के डर में। व्यंग्य यह है कि जिन जिलाधिकारियों को “सिस्टम चलाना” चाहिए, वो खुद सिस्टम के पेंच में फँसे रहते हैं। लेकिन सवीन बंसल ने दिखा दिया कि अगर नीयत साफ़ हो तो कुर्सी पर बैठकर सिर्फ फाइलें नहीं, बल्कि इतिहास भी लिखा जा सकता है।

Khushi
Author: Khushi

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