
किसानों का आंदोलन हमेशा भावनाओं से जुड़ा होता है, लेकिन हर बार इसकी आड़ में राजनीति और प्रबंधन का खेल शुरू हो जाता है। बहदराबाद टोल पर भी यही हुआ। किसान सड़क पर थे, लेकिन निशाना किसी और पर साधा गया। असल एजेंडा आंदोलन से ज्यादा नरेश राठौड़ बन गए।
अब सवाल ये है कि नरेश राठौड़ कौन हैं? लोग उन्हें कभी “धामी का दाया हाथ” तो कभी “बाया हाथ” कह रहे हैं। कोई कह रहा है उन्हीं की वजह से किसानों पर लाठी चली, तो कोई उन्हें दोषमुक्त बता रहा है। असलियत यह है कि राठौड़ कोई पागल या बेलगाम अफसर नहीं हैं। अधिकारी जब पानी सर से ऊपर चला जाए तभी कड़े फैसले लेते हैं।
पुलिस का काम कानून व्यवस्था बनाए रखना है, और सरकार का विरोध करना जनता का अधिकार है। लेकिन इस विरोध को व्यक्तिगत बनाने का खेल ही असली राजनीति है। आंदोलन किसानों का था, मगर उसमें बत्तमीजी और व्यक्तिगत दुश्मनी का तड़का लगा दिया गया।
विडंबना ये है कि आंदोलन का उद्देश्य अब खेती-किसानी के मुद्दों से हटकर “राठौड़ हटाओ” में तब्दील हो गया। यानी किसान पीछे, और अफसर आगे कर दिए गए। ये वही पुराना खेल है जिसमें असली मुद्दे दब जाते हैं और भीड़ का इस्तेमाल सत्ता विरोध और व्यक्ति विरोध की राजनीति में कर लिया जाता है।
हकीकत यही है—आंदोलन कम और नौटंकी ज्यादा। किसान का नाम, राजनीति का काम।








