“सरकारी दवा केंद्र में ताला, बाहर की दुकान पर माला—ऋतु खण्डूडी ने तोड़ा ये मकडजाला”

SHARE:

ऋतु खण्डूडी भूषण का कोटद्वार के स्वास्थ्य केंद्रों का औचक निरीक्षण शायद उन लोगों के लिए असुविधाजनक रहा होगा, जिनकी आदत बन चुकी है कि मरीज को सरकारी दवा दिखाओ और खरीदने के लिए बाहर भेज दो। यह खेल वर्षों से चलता आया है—सरकारी दवाइयाँ भंडार में पड़ी रहती हैं और मरीज की जेब बाहर की मेडिकल दुकानें भरती रहती हैं।

इस बार विधानसभा अध्यक्ष ने जब यह सच अपनी आंखों से देखा, तो डॉक्टरों को फटकार लगनी ही थी। आखिर गरीब आदमी स्वास्थ्य केंद्र इसलिए तो जाता है कि उसे बिना खर्चे दवा मिल सके, न कि बाहर की दुकान पर जाकर अपनी जेब ढीली करनी पड़े।

कर्मचारियों की उपस्थिति पंजिका देखकर जो हकीकत सामने आई, वह भी किसी से छिपी नहीं है। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर और स्टाफ अक्सर “ग़ायबगीरी” में ही माहिर पाए जाते हैं। लेकिन इस बार सीधा सीएमओ को फोन गया और अनुपस्थितों पर जवाब-तलब भी। कम से कम संदेश तो साफ है—सरकारी नौकरी का मतलब सिर्फ तनख्वाह नहीं, ज़िम्मेदारी भी है।

कलालघाटी में बने 32 बेड के NICU को देखकर राहत की उम्मीद जागी। कोविड रिलीफ फंड से बना यह यूनिट अब शुरू होने ही वाला है। छोटे शहर में इतनी बड़ी सुविधा मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं। सवाल बस इतना है कि यह सुविधा कागजों और उद्घाटनों तक ही सीमित न रह जाए, बल्कि सचमुच ज़रूरतमंद नवजातों और माताओं तक पहुँचे।

ऋतु खण्डूडी का दौरा इस बात की याद दिलाता है कि नेताओं की असली ताकत तभी दिखती है जब वे फाइलों और भाषणों से उतरकर धरातल पर पहुंचें। और हां, स्वास्थ्य केंद्र में दवा हो तो जनता को राहत मिलती है, वरना दवा की पर्ची पर लिखी हुई दुकान का नाम ही किसी का इलाज कर देता है—उसका जो दुकान चलाता है।


Khushi
Author: Khushi

Leave a Comment

सबसे ज्यादा पड़ गई