
देहरादून की हवा में इन दिनों अजीब विरोधाभास तैर रहा है। दिन में राजपुर रोड पर नशा मुक्त अभियान की रैली, भाषण और बैनरों का शोर मचाया जाता है और रात ढलते ही वही शहर क्लबों और फार्महाउसों में नशे की गिरफ्त में कैद हो जाता है। सवाल यह है कि जब नशा मुक्त अभियान की बुगल बजाई जा रही है तो भाजपा के महानगर अध्यक्ष सिद्धार्थ अग्रवाल के गेस्ट हाउस में रेव पार्टी जैसी गतिविधियाँ कैसे और क्यों हो रही हैं? क्या इनहाउस पार्टियों का लाइसेंस भी अब सत्ता के असर से जारी होता है?
देहरादून पुलिस का रवैया और भी दिलचस्प है। रेव पार्टी का मामला सामने आते ही उम्मीद थी कि बड़ी मछलियों पर शिकंजा कसा जाएगा, मगर हुआ उल्टा। अग्रवाल की ‘राजनीतिक पहचान’ और ‘सत्ता समीपता’ पुलिस के लिए ढाल बन गई। वही पुलिस जो सड़क पर सिगरेट पीते हुए युवाओं को पकड़कर नसीहत देती है, बड़े नेताओं और उनके खास लोगों की पार्टियों पर जाते-जाते क्यों चुप हो जाती है? आखिर पुलिसिया कार्रवाई का पैमाना अलग-अलग क्यों है?
अग्रवाल का हालिया रिकॉर्ड भी किसी से छिपा नहीं। मुख्यमंत्री की कुर्सी जाने की चर्चाओं को अफवाह बताकर तीन लोगों पर तत्काल मुकदमा लिखवाना उनकी सत्ता तक पहुंच का खुला सबूत था। उस वक़्त भी पुलिस ने बिना जांच पड़ताल सीधा कार्रवाई कर दी थी। अब रेव पार्टी वाले मामले में वही पुलिस अचानक सबूतों और प्रक्रियाओं की आड़ लेने लगी। क्या यह दोहरी भूमिका नहीं?
असल सवाल सिर्फ सिद्धार्थ अग्रवाल की रेव पार्टी का नहीं है। असल सवाल यह है कि देहरादून कैसे नशे और रेव पार्टियों का हब बनता जा रहा है और उस पर जिम्मेदार लोग चुप क्यों हैं? क्लब और बार खुलेआम नशे का अड्डा बने हुए हैं और हर महीने इनसे निकलने वाले करोड़ों का पैसा आखिर किन नेताओं और अफसरों की जेब भर रहा है?
कहावत है, “साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे”। भाजपा के नशा मुक्त अभियान और उनके नेताओं के गेस्ट हाउस की रेव पार्टी वाली सच्चाई ने इस कहावत को जीवंत कर दिया है। एक तरफ ढिंढोरा नशा मुक्त उत्तराखंड का, दूसरी तरफ खुद की चौखट पर नशे का जश्न। जनता पूछ रही है—ये कौन-सा अभियान है और किसके लिए है?








