

यूँ ही कोई सविन बंसल नहीं बन जाता।
ढाई घंटे पैदल चलकर दुर्गम पगडंडियों से गुजरना, गाढ़-गदेरे पार करना और आपदा पीड़ितों के घर चौखट पर बैठकर उनकी पीड़ा सुनना हर अफसर के बस की बात नहीं। यह काम वही कर सकता है जो अपनी कुर्सी को ताज नहीं, जिम्मेदारी समझता हो।
लेकिन सवाल बाकी अफसरों और जनप्रतिनिधियों से भी है—जिनकी चर्बी कुर्सी पर बैठ-बैठकर इतनी बढ़ गई है कि अब फील्ड में उतरना तो दूर, जूते पर धूल लगना भी इन्हें नागवार गुजरता है। हेलीकॉप्टर से फोटो खिंचवाकर राहत कार्य का नाटक करने वाले नेताओं और आरामकुर्सी से आदेश लिखवाने वाले अफसरों को देखना चाहिए कि असली प्रशासन कैसा होता है।
सविन बंसल का पैदल सफर यह बताता है कि ग्राउंड जीरो सिर्फ रिपोर्ट्स और मीटिंग्स से नहीं समझा जा सकता। गाँव की टूटी पगडंडी, बहा हुआ पुल, मलबे में दबा खेत और हाथ मलता किसान—यही असली फाइलें हैं, जिन्हें टेबल पर नहीं, ज़मीन पर पढ़ना पड़ता है।
व्यंग्य यह है कि जिन विभागों की लापरवाही से पुल-पुलिया बह गए, सड़कें ध्वस्त हुईं और लोग बेसहारा हुए, वही विभाग अब “पुनर्निर्माण” का दावा करते हुए मौके पर तंबू गाड़े बैठे हैं। काश यह फुर्ती आपदा से पहले दिखाई होती, तो डीएम को आज जनता का दर्द सुनने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर पगडंडियों से गुजरना न पड़ता।
सकारात्मक यह है कि ऐसे अफसर आज भी हैं, जो कुर्सी पर बैठकर मोटापा नहीं पालते, बल्कि जनता की आहट सुनने के लिए मीलों पैदल चलते हैं। और तंज यही है कि अगर बाकी अफसर और जनप्रतिनिधि अभी भी नहीं सुधरे, तो जनता का भरोसा इनकी “चर्बी” से कहीं ज्यादा भारी पड़ जाएगा।








