
उत्तराखंड की राजनीति में जब भी ईमानदारी, सादगी और दृढ़ संकल्प की चर्चा होगी, ऋतु खंडूरी का नाम वहां दर्ज पाया जाएगा। भुवन चंद खंडूरी की बेटी होने के नाते उनकी पहचान अक्सर विरासत से जोड़कर देखी जाती है, लेकिन सच यह है कि उन्होंने अपने हर कदम से यह साबित किया है कि वह किसी की छाया मात्र नहीं, बल्कि एक अलग और सशक्त राजनीतिक व्यक्तित्व हैं।
कोटद्वार की जनता के बीच उनका जो भरोसा है, वह किसी “वंशवाद की कृपा” से नहीं, बल्कि उनके अपने कर्मों से अर्जित हुआ है। उत्तराखंड की राजनीति में यह दुर्लभ है कि जनता किसी नेता को उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से हटकर उसकी व्यक्तिगत निष्ठा और कार्यशैली के लिए भी सम्मान दे। ऋतु खंडूरी ने यही किया। वे विधानसभा अध्यक्ष बनीं तो विधानसभा की गरिमा को नया आयाम दिया। जब भ्रष्टाचार, अव्यवस्था और जनहित की अनदेखी पर सवाल उठते हैं, तब वे न सिर्फ संवेदनशीलता से प्रतिक्रिया देती हैं, बल्कि दृढ़ता से खड़ी भी होती हैं।
व्यंग्य यही है कि जहां कई नेता अपनी विरासत के सहारे राजनीति की सीढ़ियां चढ़ते हैं, वहीं ऋतु खंडूरी ने उस विरासत को बोझ नहीं, बल्कि प्रेरणा बनाया। लोग कहते हैं – “खंडूरी जी की बिटिया है।” लेकिन सच यह है कि ऋतु खंडूरी आज वहां खड़ी हैं, जहां उनकी पहचान खुद उनके काम से है। अगर कोई यह सोचता है कि उनकी ताकत सिर्फ “बिटिया होना” है, तो यह सोच उतनी ही खोखली है जितनी खोखली कुर्सियों पर बैठकर भाषण देने वाले नेताओं की आवाज़।
सकारात्मक तंज यही है कि कोटद्वार की जनता ने उन्हें इसलिए चुना क्योंकि वह जनता की समस्याओं को समझती हैं, उनसे जुड़ती हैं, न कि इसलिए कि उनके पिता मुख्यमंत्री रह चुके हैं। और व्यंग यही है कि जहां कई नेता जनता को “अपना वोट बैंक” समझते हैं, ऋतु खंडूरी उन्हें अपना परिवार मानती हैं।
आज उत्तराखंड की राजनीति में जब भी यह सवाल उठेगा कि कौन नेता वास्तव में “जनता का भरोसा” जीता है, तो ऋतु खंडूरी का नाम उस इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज होगा। उन्होंने यह दिखाया है कि महिला होने के बावजूद, और विरासत का ठप्पा लगने के बावजूद, अगर आपके पास ईमानदारी और काम की ताकत है, तो राजनीति आपको सम्मान देती ही है।
ऋतु खंडूरी सिर्फ भुवन चंद की बिटिया नहीं, बल्कि उत्तराखंड की राजनीति की वह मजबूत स्तंभ हैं जिनके बिना आने वाले दौर की कहानी अधूरी रहेगी।








