“डीएम की स्पेशल तैनाती का असर – फुलैत-छमरोली में मुआवजा वितरण युद्धस्तर पर, प्रभावितों को मिली लाखों की राहत”

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डीएम के फुलैत और छमरोली भ्रमण की यह कहानी बिल्कुल सिस्टम के क्लासरूम जैसी लगती है। यहां होमवर्क दिया गया था – क्षति का आंकलन करना है, मुआवजा बांटना है, और वह भी “युद्धस्तर” पर। दिलचस्प यह है कि युद्ध तो दुश्मनों से लड़ा जाता है, लेकिन यहां दुश्मन मुआवजा वितरण की सुस्त रफ्तार थी, जिसे आखिरकार मात दे दी गई।

स्पेशल तहसीलदार और बीडीओ की तैनाती भी मानो “बचाव की स्पेशल फोर्स” की तरह कर दी गई। प्रशासन का यह कदम कम से कम यह तो साबित करता है कि सही समय पर सही मोर्चे पर सही अफसर उतार दिए जाएं तो फाइलों का हिमालय भी पिघल सकता है।

सहायता बांटने का ब्योरा भी किसी परीक्षा के मार्कशीट जैसा है – फुलैत में 39 प्रभावितों को 5,48,000 रुपए, छमरोली में 48 प्रभावितों को 6,47,500 रुपए। यहां हर खंड की अलग-अलग सब्जेक्ट कॉपी जांची गई – कहीं भवन आंशिक क्षतिग्रस्त, कहीं पूर्ण क्षतिग्रस्त, कहीं फसल का नुकसान, तो कहीं भूमि कटान। और सबको अपने-अपने हिस्से की “कॉपी का नंबर” मिल गया।

तंज यह है कि आपदा प्रबंधन अब “पॉइंट टेबल” बन गया है, जहां अंक बांटे जाते हैं और फिर रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने लहराया जाता है। लेकिन सकारात्मकता यह भी है कि डीएम ने कम से कम प्रभावितों के जख्मों पर पहली परत का मरहम तो लगाया। वरना अक्सर यह मरहम फाइलों में ही सूख जाता है।

फिलहाल यह पहल बताती है कि जब नेतृत्व और इच्छाशक्ति दोनों मिल जाएं तो राहत कार्य भी टालमटोल से निकलकर “युद्धस्तर” पर पहुंच सकते हैं। अब देखना यह है कि यह स्पीड आगे भी बनी रहती है या फिर सिस्टम दोबारा अपनी पुरानी रफ्तार – कछुए वाली चाल – पकड़ लेता है।

Khushi
Author: Khushi

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