
न्यायालय की ऊँची-ऊँची दीवारों के बीच जब बालिका सुरक्षा पर चिंतन होता है तो यह सुखद भी लगता है और थोड़ी विडंबना भी। सुखद इसलिए कि देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था और उसके माननीय न्यायमूर्ति खुद आगे आकर बालिकाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण पर बोलते हैं। विडंबना इसलिए कि आज़ादी के 75 साल बाद भी हमें यह याद दिलाना पड़ रहा है कि बालिका भी इंसान है, उसके अधिकार भी बराबर हैं और उसकी सुरक्षा भी राज्य की जिम्मेदारी है।
भवाली की उजाला अकादमी में “बालिका सुरक्षा” पर आयोजित यह कार्यशाला कागज़ पर तो सुनहरी दिखती है। मुख्य न्यायाधीश से लेकर तमाम माननीय न्यायमूर्ति तक सबने अपने-अपने हिस्से की बात कही। तमिल कवि भारती की पंक्तियाँ सुनाईं गईं, पॉक्सो एक्ट, एमटीपी एक्ट, पीसीपीएनडीटी एक्ट पर गहन विमर्श हुआ। सुनने में सब सुन्दर, पर ज़मीनी हकीकत में बच्चियाँ अभी भी बाल विवाह की शिकार हैं, दहेज और तस्करी का दंश झेल रही हैं, और स्कूल तक सुरक्षित पहुँचने की गारंटी तक नहीं।
न्यायमूर्ति रवींद्र मैथानी का यह कहना कि “इतने वर्षों के संवैधानिक प्रावधानों और योजनाओं के बाद भी हम बालिका सुरक्षा पर चिंतन कर रहे हैं” शायद इस पूरे आयोजन का सबसे सटीक सार है। यही सबसे बड़ा कटाक्ष है हमारी व्यवस्था पर। योजनाएँ, कानून और समितियाँ सब हैं, पर ज़रूरत क्यों पड़ रही है बार-बार इनकी समीक्षा की?
विशेषज्ञों, अफसरों और समाजसेवियों की लंबी सूची कार्यशाला की शोभा बढ़ाने में तो सफल रही, पर सवाल यह है कि क्या उनकी बातें ग्रामीण आंगनबाड़ी तक पहुँचेंगी? क्या पुलिस चौकी तक यह संकल्प पहुँचेगा कि बाल विवाह नहीं होने देंगे? या फिर यह सब एक और “कार्यशाला” बनकर फाइलों में दर्ज हो जाएगा?
फिर भी, सकारात्मकता यह है कि शीर्ष स्तर पर संवाद हुआ, दस्तावेज़ विमोचित हुए और उम्मीद जगाई गई कि इन निष्कर्षों को जमीन पर लागू किया जाएगा। यह उम्मीद रखना भी ज़रूरी है, वरना ये कार्यशालाएँ सिर्फ़ फोटो खिंचाने और अखबार सजाने के लिए ही रह जाएँगी।
बालिका सुरक्षा पर चिंता करना प्रशंसनीय है, लेकिन असली चुनौती है इस चिंता को “कार्रवाई” में बदलना। वरना बालिकाएँ आज भी वही सवाल पूछेंगी—“सम्मेलन तो बहुत हुए, पर हमारी सुरक्षा कब होगी?”








