
उत्तराखंड ने नकल विरोधी कानून 2023 लागू कर यह साफ संदेश दे दिया था कि अब न तो ‘पेपर माफिया’ बचेगा और न ही ‘कोचिंग गैंग’। आजीवन कारावास और 10 करोड़ तक जुर्माने वाले प्रावधान सुनकर विरोधियों ने खूब तंज कसे थे—लेकिन पिछले चार साल की साफ-सुथरी परीक्षाओं और 25 हज़ार युवाओं को मिली सरकारी नौकरियों ने ही उनके तंज को जवाब बना दिया।
अब जैसे ही हालिया UKSSSC प्रकरण में परीक्षा शुरू होते ही तीन पन्ने वायरल हुए, विरोधियों ने इसे “पेपर लीक” का ठप्पा चिपकाने की कोशिश की। जबकि सच्चाई ये है कि आरोपी खालिद मलिक और उसके ‘फैमिली गैंग’ की हरकत ने पूरे सिस्टम को शर्मिंदा किया। SIT बनी, जिम्मेदार निलंबित हुए, और जांच हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की देखरेख में चल रही है।
मगर विरोधियों की राजनीति देखिए—तीन पन्ने देखकर ऐसे उछल पड़े मानो पूरा प्रश्नपत्र हाकम सिंह के गोदाम में छपकर निकला हो। जो चार साल तक पारदर्शी भर्ती देखकर चुप थे, वही आज अचानक नकल माफिया के ‘सुपर हीरो’ बन बैठे हैं। असलियत ये है कि नकल को संरक्षण देने वाले वही लोग हैं जो आज सरकार से सवाल पूछ रहे हैं।
सरकार का रुख बिल्कुल साफ है—अब न रिश्तेदारी चलेगी, न सिफ़ारिश। मेहनत और मेरिट ही चलेगी। और जो लोग हर बार युवाओं का भविष्य बिगाड़कर राजनीति चमकाने की कोशिश करते हैं, उनके लिए STF की डंडा पॉलिसी ही असली जवाब है।








