
राजनीति के गलियारों में मन की भावनाएँ अक्सर मुखर नहीं होतीं, लेकिन उनकी झलक हर बार बयानबाजी में दिख जाती है। त्रिवेंद्र सिंह रावत के मन में फिलहाल यही चल रहा होगा—गदगद हैं, लेकिन थोड़ी असहजता के साथ। सोचिए, वह वही काम करना चाहते थे जो अब सीएम धामी ने कर दिया—सीबीआई जांच की मंजूरी। और उन्होंने यह मान लिया कि पिछली सरकार की अक्षमता के चलते यह कदम कभी नहीं उठ पाया।
यह मन की गहराई है कि अपने घर पर आतिशबाजी करवा लेने का मज़ाक बना रहे हों—अर्थात श्रेय किसी और को, और जश्न अपनी नाकामी पर। इस सोच में व्यंग छिपा है: “देखो, जो मैं नहीं कर पाया, वह धामी ने कर दिखाया। अब नकल माफियाओं की खैर नहीं।”
राजनीतिक दृष्टि से यह एक मास्टरस्ट्रोक है। विपक्ष का सबसे बड़ा हथियार—नकल और पेपर लीक का मुद्दा—सीएम ने छीन लिया। और, जो पार्टी के भीतर छुपे विरोधी थे, उनके लिए यह अप्रत्यक्ष तमाचा है। त्रिवेंद्र जी के मन में शायद यही चल रहा है कि उनका अधूरा काम अब किसी और ने पूरा कर दिया, और जनता का भरोसा उसी नए नेतृत्व की ओर लौट गया।
असल में, यह दृश्य राजनीति की बड़ी सटीक तस्वीर पेश करता है—जहाँ एक फैसले ने जनता का विश्वास भी जीता, विपक्ष को चौंकाया, और पार्टी के भीतर छुपे विरोधियों को हाशिए पर धकेल दिया। और पीछे रह गए नेता? वे केवल अपने घर में मन ही मन आतिशबाजी कर सकते हैं—जश्न तो दूसरे ने मना लिया।








