राजपुर रोड का नज़ारा ही कुछ और था। वीडियो वायरल हुआ तो लगा जैसे किसी वेब सीरीज़ का नया एपिसोड रिलीज़ हो गया हो—फर्क बस इतना कि इसमें हीरो कोई कलाकार नहीं बल्कि राजपुर थाने के एसओ शेंकी सिंह निकले। नशे में धुत्त होकर गाड़ियां ठोकने का साहस आम आदमी में नहीं होता, ये विशेषाधिकार तो वर्दीवालों के लिए आरक्षित है। कप्तान अजय सिंह ने तत्काल संज्ञान लिया, निलंबन का फरमान जारी किया, नया एसओ नियुक्त कर दिया। अब सवाल ये है कि इतनी छूट आखिरकार क्यों और किसलिए?
देहरादून की सड़कों पर अक्सर युवाओं को “ड्रिंक एंड ड्राइव” के लिए पकड़ा जाता है, भारी-भरकम चालान होते हैं, फोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया पर “सबक” सिखाया जाता है। लेकिन जब खुद एसओ साहब ही “लाइव डेमो” देने लगें तो जनता किससे उम्मीद रखे? लगता है राजपुर रोड का नया टैगलाइन यही होना चाहिए—”शाम की रंगीनियां, पुलिस की ड्राइविंग स्किल्स के साथ।”
कप्तान साहब की फुर्ती सराहनीय है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि ये घटनाएं बताती हैं कि पुलिस महकमे के भीतर अनुशासन का अर्थ अब सिर्फ जनता के लिए रह गया है। एसओ को अगर इतना ही मन था तो कम से कम किसी ड्राइवर को साथ ले लेते। आखिर कुर्सी संभालने से ज्यादा महत्वपूर्ण जनता की सुरक्षा है या नहीं?
जनता अब यही कह रही है—गाड़ी आज तेरा भाई एसओ चलाएगा, कल उसी रोड पर हमें चालान थमाएगा। ऐसे में समाधान यही दिखता है कि राजपुर रोड की कमान किसी बुज़ुर्ग अफसर को दी जाए, जिन्हें नशे के बजाय नशा नियंत्रण की आदत हो। वरना यह ड्रामा बार-बार दोहराया जाएगा और जनता बस तमाशबीन बनकर देखेगी।
असल में बात साफ है—वर्दी पहन लो तो कानून अलग, वर्दी उतार दो तो कानून अलग। जनता अब पूछ रही है—आखिर पुलिस के लिए भी कोई पुलिस है क्या?








