
राजनीति और पत्रकारिता का मिलाजुला खेल अब खुलेआम मंच पर नाच रहा है। मामला कुछ यूँ है कि एक साहब हैं—“एमपी साहब”—और उनके संरक्षण में पलता बढ़ता एक तथाकथित पत्रकार है। इस पत्रकार को न पत्रकारिता की समझ है, न ही मर्यादा की। लेकिन अहंकार ऐसा कि खुद को आईएएस समझ बैठे हैं। काम क्या है? जगह-जगह सीएम की किरकिरी करवाना, अधिकारियों को सीएम और एमपी के नाम पर दबाव में लेने की कोशिश करना और खुद को सत्ता का अघोषित प्रवक्ता साबित करना।
असल में ये “पोर्टलबाज़” पत्रकारिता के नाम पर ब्लैकमेलिंग और दबाव बनाने का धंधा चला रहा है। जनता की आवाज़ उठाना तो छोड़िए, यह अपने एमपी साहब की ढाल बनकर घूमता है। जहाँ ज़रूरत हुई, वहीं सीएम का नाम उछालकर अपनी चमक दिखाता है। लेकिन नतीजा? जनता और अफसरों के बीच सीएम की छवि धूमिल होती है।
विडंबना देखिए—सीएम की छवि सुधारने के लिए दिन-रात मेहनत करने वाली सरकार को ये “छूट भैया” पत्रकार ही बट्टा लगवाता है। पत्रकारिता की आड़ में दलाली करना, चापलूसी को खबर बताना और धमकी को रिपोर्टिंग कहना… यही इनका एजेंडा है।
एमपी साहब शायद भूल गए हैं कि ऐसे पोषित लोग जितना फायदा कमाते हैं, उससे कहीं ज्यादा नुकसान कर जाते हैं। जनता सब जानती है कि कौन पत्रकार है और कौन दलाल। लेकिन सत्ता में बैठे लोग शायद अभी भी इस “छूट भैया” की पोल खुलने का इंतज़ार कर रहे हैं।
असल में, यह पत्रकारिता नहीं, बल्कि “प्रेस कॉन्फ्रेंस के नाम पर प्रॉपर्टी डीलिंग” है। और इस खेल में हारती है सिर्फ़ जनता की उम्मीदें और सीएम की साख।








