
कभी भूख से पेट जलता था, आज जिम्मेदारियों की आग में तपते हैं—यह कहानी किसी फिल्म की नहीं, आईएएस सुरेंद्र सिंह की है। मथुरा के खेतों से शुरू हुआ यह सफर आज सत्ता के गलियारों तक पहुंच चुका है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सबसे भरोसेमंद अधिकारियों में शामिल इस अफसर ने जीवन के हर संघर्ष को सीढ़ी बनाकर ऊपर चढ़ना सीखा है।
कभी घर में रोटियों की गिनती होती थी, आज फाइलों की मोटाई होती है। वो वक्त भी था जब घर में अनाज नहीं होता था, और अब वो दौर है जब सूबे की नीतियों का अनाज लोगों तक पहुंचे, इसकी जिम्मेदारी इन्हीं के कंधों पर है।
तीन बार पीसीएस पास किया, पर ठान लिया कि “मंज़िल वही होगी जो दिल चाहे”—आईएएस बनना था तो बनकर ही दिखाया। संघर्ष का यह सिलसिला मथुरा से दिल्ली और फिर राजस्थान तक चला, और हर पड़ाव पर ‘संघर्ष’ इनका स्थायी पता रहा।
कभी सूखी रोटियों से पेट भरा, आज सादगी से सिस्टम चला रहे हैं। मेरठ की गरिमा सिंह से विवाह के बाद भी जीवन में वैसा ही अनुशासन और सादापन कायम है जैसा गांव की गलियों में था। दो बेटियों के पिता सुरेंद्र सिंह आज भी न रौब दिखाते हैं, न रुतबा—बस काम बोलता है।
मुजफ्फरनगर के चर्चित डीएम रहे सुरेंद्र सिंह ने जिस तरह वहां प्रशासन की सूरत बदली, वो आज भी चर्चा का हिस्सा है। कुछ अफसर कुर्सी से बड़े हो जाते हैं, और सुरेंद्र सिंह उन्हीं में से एक हैं।
युवाओं के लिए संदेश बिल्कुल सीधा है—अगर पेट की भूख ने हौसला नहीं तोड़ा, तो किस्मत भी एक दिन झुककर सलाम करती है।
संघर्ष की मिट्टी में जिसने पसीना बहाया, वही प्रशासन की जमीन पर पौधा बनकर खड़ा है—नाम है सुरेंद्र सिंह।








