“एजेंडे के धंधे में धुलता सच — सुपारी किलर न्यूज़ लॉन्ड्री का नया प्रपंच”

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वाह भई वाह, आखिरकार उत्तराखंड भी “विज्ञापन-प्रधान” राज्य बन गया — जहां विकास की नहीं, विज्ञापन की चमक से आंखें चौंधिया जाएं। न्यूज़ लॉन्ड्री ने कहा — “355 करोड़ प्रिंट विज्ञापनों पर खर्च हुए, जिनमें से 314 करोड़ धामी सरकार के दौर में।” सुनने में भारी लगता है न? जैसे किसी भ्रष्टाचार की गंध हो। लेकिन ठहरिए, आंकड़े अगर पूरे पढ़े जाएं तो तस्वीर कुछ और कहती है।

हर सरकार के पास एक सूचना विभाग होता है, जिसका बजट सालाना तय होता है — प्रचार-प्रसार, जन-जागरूकता, सरकारी योजनाओं की जानकारी और मीडिया से संवाद के लिए। यह कोई निजी जेब से बांटी गई रकम नहीं, बल्कि तय योजना के तहत स्वीकृत राशि होती है। अब अगर पांच साल में 355 करोड़ खर्च हुए, तो औसतन हर साल करीब 70 करोड़। यानी कुल बजट का एक हिस्सा। यह रकम पर्यटन, आपदा-सूचना, कोविड जैसी संकट स्थितियों और सरकारी योजनाओं के प्रचार पर जाती है। लेकिन न्यूज़ लॉन्ड्री ने ऐसा दिखाया जैसे पूरा खजाना अखबारों में उड़ेल दिया गया हो — बस बाकी राज्य किसी “विज्ञापन उद्योग” की शाखा बन गया।

अब आते हैं उस “72 लाख वाली पत्रिका” पर। कहानी बड़ी मजेदार है — कहा गया कि एक ऐसी पत्रिका को लाखों का विज्ञापन दिया गया जिसका आप. एन. आई. नम्बर ही नहीं था। सुनकर ऐसा लगता है जैसे कोई गुप्तचर पत्रिका रातोंरात छपकर सरकारी नोटों पर बैठ गई। यहॉ पत्र पत्रिका के प्रकाशन की प्रक्रिया को समझने वाले जानते हैं की किसी भी पत्र पत्रिका का प्रवेशांक जिसका की आर.एन. आई बाद में रजिस्टर्ड हो कर आता है किंतु पत्र पत्रिकाओं के प्रवेशांको में विज्ञापन देने के पूर्ववर्ती परंपरा रही हैं जिसके तहर नवीन पत्र पत्रिकाओं को विज्ञापन दिये जाते है और रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया नियमानुसार जारी रहती है, फाइलिंग चल रही होती है, और विभागीय सूची में अस्थायी रूप से शामिल कर लिया जाता है। लेकिन इसे “घोटाला” बताना केवल झूठे नरेटिव सेट करने से ज़्यादा कुछ नही है।

असल में ये रिपोर्ट किसी वित्तीय विसंगति से ज्यादा एक नैरेटिव है — “देखो सरकार पैसा उड़ा रही है।” मगर सवाल उठता है — कौन सी सरकार विज्ञापन नहीं देती? दिल्ली से लेकर चेन्नई तक, हर सरकार अपनी नीतियों को जनता तक पहुंचाने के लिए मीडिया का सहारा लेती है। फर्क सिर्फ इतना होता है कि किसका प्रचार “अभियान” कहलाता है और किसका “अपव्यय”?

मीडिया को भी अब आत्ममंथन करना चाहिए — जब खजाना खुले तो सब दौड़ लगाते हैं “हमें भी दो”, लेकिन जब कोई और ले जाए तो “पारदर्शिता का शोर” मच जाता है। कभी-कभी आलोचना इसलिए भी तेज होती है क्योंकि किसी का हिस्सा कम पड़ गया। और यही असली व्यंग्य है — जो पत्रकारिता के नाम पर निष्पक्षता का झंडा उठाए खड़े हैं, वे भी विज्ञापन की कतार में सबसे आगे दिखाई देते हैं।

धामी सरकार पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन अर्धसत्य दिखाकर सनसनी फैलाना पत्रकारिता नहीं, एजेंडा है। पांच साल के कुल बजट को एकतरफा दिखाकर यह जताना कि मानो सरकार ने अखबारों को “खरीद” लिया, यह वैसा ही है जैसे कोई पांच साल की सैलरी देखकर कह दे — “अरे ये तो करोड़पति है!”

सरकारों को जवाबदेह रहना चाहिए, ये बात सही है। लेकिन आलोचना करने वालों को भी जिम्मेदारी निभानी चाहिए कि वे आधी हकीकत को पूरा सच न बनाएं। आखिर सवाल वही है — जो नैरेटिव बना रहे हैं, क्या वे खुद किसी नैरेटिव के तहत नहीं काम कर रहे? जहॉ जहॉ कांग्रेसी सरकारें हैं वहॉ न्यूज़ लांड्री ने कितने खुलासे किये हैं अभी तक ?

सच्चाई यह है कि उत्तराखंड की सरकार का प्रचार खर्च “अनियमित” कम और “राजनीतिक चश्मे” से देखा गया ज्यादा है। जिस बजट में यह कहा जा रहा है की मुख्यमंत्री की छवि गढ़ने में फ़िज़ूल खर्च कर दिया गया उसकी असली सच्चाई है की G20 जैसे बड़े इंवेट उत्तराखंड में आयोजित किये गये जिसने उत्तराखंड की छवि को विश्व स्तर पर स्थापित किया है। नेशनल गेम जैसा बड़ा आयोजन जिसको उत्तर प्रदेश जैसा राज्य अबतक आयोजित नहीं कर पाया वो उत्तराखंड सरकार ने बड़े शानदार तरीक़े से आयोजित किये जिसके बाद उत्तराखंड को देवभूमि, सैन्यभूमी के बाद खेलभूमी के नाम से सुशोभित किया जाने लगा।

उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में निवेश के लिए वृहद पैमाने पर इंवेस्टमेंट समिट का आयोजन किया गया जिसके फलस्वरूप एक लाख करोड़ से अधिक के निवेश की ग्राउंडिंग भी एचीव की गई । इन सब आयोजनों के प्रचार प्रसार में उत्तराखंड सूचना विभाग की शाबाशी होनी चाहिए जबकि उसको कुछ जेहादी मानसिकता के लोगों ने एजेंडे के तहत घोटाला करार दे दिया, क्यों क्योंकि उनका मकसद ही उत्तराखंड की छवि धूमिल करना है ।

कुल मिलाकर मामला ऐसा है — न्यूज़ लॉन्ड्री ने एक विशेष षड्यंत्र के तहत आंकड़ों की बाजीगरी से एक ऐसा नरेटिव सेट किया जो आम आदमी में किसी घोटाले का भ्रम पैदा कर सके,और बाकी मीडिया ने न्यूज़ लांड्री के इस षड्यंत्र पर से पर्दा उठाने के बजाय उनके ही एजेंडे को आगे बढ़ा दिया ? जनता ने पढ़ा, गुस्सा आया, और सरकार पर उंगली उठी। पर जो लोग यह कहानी लिख रहे हैं, उन्हें खुद आईने में झाँकना चाहिए — पत्रकारिता में पारदर्शिता की मांग अच्छी है, पर जब वही पारदर्शिता अपने विज्ञापन खातों पर लागू करनी पड़े, तब सबका चेहरा धुंधला पड़ जाता है। क्या न्यूज़ लांड्री जो अपने को पत्रकारिता की सुचिता का ब्रांड अम्बेसडर बता रही हैं ? इनका इतिहास खँगाल लीजिए आज तक इन्होंने कांग्रेस और वामपंथी विचारधारा वालो के सुपारी किलर से ज़्यादा की कोई भूमिका नहीं निभाई है, तो लोगों को इनके नरेटिव से सावधान रहने की ज़रूरत हैं ।

Khushi
Author: Khushi

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