
अब जरा सोचिए — एक आदमी जो सुबह से शाम तक सिस्टम के भीतर पारदर्शिता और ईमानदारी की बात करता है, जो न किसी लॉबी में दिखता है, न किसी गुट में, न किसी विवाद में — उसी को अब कुछ तथाकथित “खुलासा प्रेमियों” ने निशाने पर ले लिया है।
भाई, ये देश का ट्रेंड हो गया है — जो काम करे, उसे बदनाम करो। जो चुप रहे, उसे उकसाओ। और जो सच्चाई बोले, उसे कंट्रोवर्सी में घसीटो।
बंशीधर तिवारी उन अफसरों में से हैं, जो अपनी फाइलों से ज़्यादा अपने कर्म से जाने जाते हैं। लेकिन कुछ लोगों को शायद ये बात हजम नहीं होती। जिन्हें न जिम्मेदारी निभानी आती है, न ईमानदारी देखी जाती है — वो सोशल मीडिया पर बकवास की दुकान खोलकर बैठे हैं।
किसी को विज्ञापन नहीं मिला, तो वो “जनहित में” पोस्ट डाल देता है। किसी का ठेका नहीं चला, तो वो “भ्रष्टाचार उजागर” करने लग जाता है। भाई, तुम्हारी ये कुंठा और जलन अब पुरानी हो चुकी है। सिस्टम अब डरता नहीं है, जवाब देता है — और वो जवाब है कानूनी कार्रवाई।
और रही बात बदनाम करने की — तो समझ लो, बंशीधर तिवारी जैसे अफसर तुम्हारे ट्वीट या पोस्ट से बदनाम नहीं होंगे। उनका नाम काम से चलता है, ट्रेंड से नहीं। और तुम्हारे ये छोटे-छोटे “डिजिटल हथियार” उनकी ईमानदारी की ढाल को छू भी नहीं सकते।
दरअसल, तुम्हारी समस्या तिवारी नहीं हैं, तुम्हारी समस्या है कि कोई अफसर सिस्टम के भीतर रहकर साफ-सुथरा काम कैसे कर सकता है। तुम्हारे जैसे लोगों को लगता है कि सबकी अपनी दुकान चल रही है, तो ये क्यों नहीं चला रहा।
मगर भूल जाओ भाई — ये तिवारी सब पर भारी है।
तुम्हारी कुंठा, तुम्हारा जलन और तुम्हारा एजेंडा — सब चलता रहेगा, लेकिन तिवारी का नाम काम से गूंजेगा। क्योंकि सच हमेशा थोड़ा धीमे चलता है, पर पहुंचता ज़रूर है — और इस बार सच का नाम है बंशीधर तिवारी।








