
उत्तराखंड की राजनीति में आज अगर कोई चेहरा जनता की उम्मीद, विश्वास और निर्णायक नेतृत्व का पर्याय बन चुका है, तो वह है पुष्कर सिंह धामी। इसीलिए यह बिल्कुल स्वाभाविक है कि जिनके राजनीतिक अस्तित्व पर धूल जम चुकी है, वे अब उसी धामी को निशाने पर ले रहे हैं। लेकिन दिलचस्प यह है कि ये सीधा राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि “छवि पर हमला” है — वो भी योजनाबद्ध, बारीकी से बुने गए सोशल मीडिया के ताने-बाने के जरिये।
वामपंथी सोच की जो पुरानी परंपरा “विरोध में अस्तित्व” तलाशती रही है, वही अब डिजिटल रूप में सक्रिय दिख रही है। एक तरफ धामी सरकार ने राज्य में डेमोग्राफी, कानून व्यवस्था, निवेश और रोजगार जैसे मुद्दों पर ठोस कदम उठाए हैं, दूसरी तरफ वही कदम वामपंथी हलकों में बेचैनी का कारण बने हैं। क्योंकि उत्तराखंड में स्थिरता और राष्ट्रवादी नीति, उनके पुराने “एजेंडे” के लिए खतरा हैं।
धामी ने अपने नेतृत्व में राज्य को एक नई दिशा दी — विकास के साथ वैचारिक स्पष्टता की दिशा। यही बात उनके आलोचकों को सबसे अधिक चुभ रही है। जो कभी “आंदोलन” के नाम पर सड़क पर उतरते थे, वे अब “एल्गोरिदम” के जरिए माहौल गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। ये वही जमात है जो विकास के हर प्रयास में मीन-मेख निकालती








