एक तिवारी सब पर भारी, सुनियोजित दुष्प्रचार का महल ढह गया

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अब क्या करोगे बे एजेंटों?
इतना शोर मचाया, इतने पोस्ट डाले, इतनी झूठी कहानियाँ गढ़ीं—और आखिर में निकला क्या? हवा!
सच्चाई वही निकली जो शुरू से थी—डीजी सूचना के खिलाफ चलाया गया सारा अभियान एक फर्जी जाल था, एजेंडे की बदबू से भरा हुआ। झूठ को सच की शक्ल में परोसने वालों के हाथों में अब सिर्फ शर्म बची है, वो भी अगर बचे तो।

जिस दौर में अफवाहें हथियार बन चुकी हैं, उस दौर में सच बोलना बगावत जैसा है। लेकिन सच ये है कि न कोई साजिश थी, न कोई हत्या। सब कुछ जांच में साफ हो गया। सड़क हादसा था, हादसा! पर तुम्हें तो हेडलाइन चाहिए थी—“आईएएस ने पत्रकार को मरवाया।” क्योंकि सच्चाई में TRP नहीं होती, उसमें ‘कटाक्ष’ नहीं होता, उसमें वो झूठा रोमांच नहीं होता जो फर्जी नरेटिव बेचने वाले एजेंटों को चाहिए।

डीजी सूचना पर कीचड़ उछालने की कोशिश ऐसे की गई जैसे किसी ने न्यायालय का फैसला अपने मोबाइल से ही सुना दिया हो। अब वही मोबाइल हाथ में कांप रहे हैं। झूठ की नींव इतनी खोखली थी कि सच्चाई की एक रिपोर्ट आई और पूरा महल ढह गया।

जो लोग खुद को “सत्य के प्रहरी” बताते हैं, वही इस फर्जी मुहिम में शामिल पाए गए। कोई विदेशी नाम से पोस्ट डाल रहा था, कोई लोकल एजेंट बनकर “इंसाफ” की बातें कर रहा था। असल में यह सब वही पुराना खेल था—सरकार को घेरो, अफसर पर कीचड़ उछालो, और माहौल बिगाड़ो।

लेकिन उत्तराखंड की जनता भोली है, बेवकूफ नहीं। उसे समझ आ गया कि कौन सच्चाई दिखा रहा है और कौन स्क्रीन के पीछे से राजनीति खेल रहा है।

अब क्या करोगे बे एजेंटों?
सच्चाई ने तुम्हारे नरेटिव को बेरहमी से नंगा कर दिया है।
जिन्होंने सिस्टम को गिराने की कोशिश की, वही अब अपनी विश्वसनीयता गिरा बैठे हैं।

अब अगली बार झूठ फैलाने से पहले कम से कम इतना तो सोच लेना कि “सत्य” का भी अपना धैर्य होता है—और जब वो जवाब देता है, तो पूरे एजेंडे को जमीन में गाड़ देता है।

Khushi
Author: Khushi

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