डीएम सविन बंसल ने सिखाया सबक: नामी स्कूल झुका, शिक्षिका को मिला इंसाफ

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कभी-कभी किसी संस्थान की “शिक्षा” दीवारों से नहीं, जिलाधिकारी के डंडे से निकलती है। देहरादून के नामी-गिरामी इडिफाई स्कूल ने महीनों तक शिक्षिका कनिका मदान का वेतन और अनुभव प्रमाण पत्र दबाए रखा — शायद उन्हें यह भूल हो गई थी कि शिक्षा केवल बच्चों को सिखाने का नहीं, ईमानदारी निभाने का भी नाम है।

पर जब मामला डीएम सविन बंसल के दरबार पहुँचा, तो जिस स्कूल को “वर्ल्ड क्लास” कहा जाता है, वो रातोंरात “घुटनों पर” आ गया। न तो अब कोई बहाना, न ही कोई देरी—वेतन के चेक और अनुभव प्रमाण पत्र उसी रफ्तार में जारी हुए, जिस स्पीड से डीएम के आदेश निकले।

कहते हैं न, जहाँ नियम झुकते हैं, वहाँ न्याय खड़ा हो जाता है। जिलाधिकारी सविन बंसल ने साबित कर दिया कि जनता दर्शन केवल सुनवाई नहीं, न्याय की आखिरी चौकी है। शिक्षिका ने महीनों की जिल्लत सही, पर आखिरकार उसकी मेहनत की कीमत उसे मिली — वो भी उसी से, जो उसे रोक कर बैठा था।

अब सवाल यह है कि ऐसे स्कूल जो “वर्ल्ड” की बात करते हैं, क्या उन्हें “इंसानियत” का सबक डीएम से ही सिखाना पड़ेगा? फीस के एक दिन की देरी पर पैरेंट्स को नोटिस भेजने वाले स्कूल जब खुद महीनों वेतन रोकते हैं, तो यह शिक्षा नहीं, शोषण का पाठ बन जाता है।

डीएम सविन बंसल का यह एक्शन केवल एक शिक्षिका के हक की जीत नहीं, बल्कि उन तमाम शिक्षकों के आत्मसम्मान की जीत है, जो निजी संस्थानों के तले चुपचाप अपमान सहते हैं।
अब देहरादून में संदेश साफ है —
“यदि किसी का हक दबाओगे, तो बंसल का बुलावा आएगा।”

और इडिफाई स्कूल?
अब शायद वो सच में “एडिफाई” हो गया होगा — क्योंकि उसे जिलाधिकारी ने असली शिक्षा दे दी है।

Khushi
Author: Khushi

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