
रविवार का दिन था — जब अधिकांश अधिकारी छुट्टी का आनंद लेते हैं, तब एक तिवारी साहब थे जो राजपुर रोड की सुबह निहार रहे थे। हाथ में फाइल नहीं, बल्कि काम का मुआयना था; और चेहरे पर वही संतोष, जो किसी शिक्षक को अपने होनहार विद्यार्थी को देखकर होता है। देहरादून के दिल — राजपुर रोड — पर जब उन्होंने कदम रखा, तो कामगारों के चेहरे खिल उठे, मानो बॉस नहीं, कोई प्रेरक खुद मैदान में उतर आया हो।
एमडीडीए के उपाध्यक्ष बंशीधर तिवारी उन गिने-चुने अफसरों में से हैं जो “ऑफिस से निकलकर ज़मीन पर उतरना” सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं रखते। दिलाराम चौक से लेकर हाथीबड़कला तक जो दीवारें अब रंगीन हो चली हैं, वे सिर्फ कला नहीं, बल्कि एक दृष्टिकोण की झलक हैं — “विकास कागज़ पर नहीं, सड़कों पर दिखना चाहिए।” और वाकई, सड़कों पर दिख भी रहा है — कहीं पौधों की हरियाली, कहीं म्यूरल आर्ट की ताजगी, तो कहीं कर्मचारियों के जोश में नया उजाला।
देहरादून की दीवारें अब बोलती हैं — “स्वच्छ रहो, हरा रखो”, और डिवाइडर पर खिले फूल बताते हैं कि किसी ने शहर की नब्ज़ समझी है। एक तिवारी अपने काम में भारी हैं — न नारे लगाते हैं, न फोटो सेशन कराते हैं, बस काम खुद बोलता है। छुट्टी के दिन जब बाकी लोग आराम कर रहे थे, तब वे राजपुर रोड पर “सौंदर्यीकरण” नहीं, “संवेदनशीलता” की तस्वीर बना रहे थे।
शायद देहरादून का सौंदर्य अब किसी योजना की फाइल में नहीं, बल्कि इन सड़कों की मुस्कुराहट में बस गया है। और यह सब उस अधिकारी की वजह से है, जिसने साबित किया — अगर मंशा साफ हो, तो “क्लीन एंड ग्रीन सिटी” कोई नारा नहीं, एक सच बन जाती है।








