

सरदार वल्लभभाई पटेल — वो नाम जिसने टुकड़ों में बिखरे भारत को एक सूत्र में पिरो दिया। जिनके लौह इरादों ने रियासतों को जोड़कर एक भारत, श्रेष्ठ भारत की नींव रखी। अब जब देहरादून 31 अक्टूबर को पटेल की 150वीं जयंती पर “एकता पदयात्रा” निकालने जा रहा है, तो यह सिर्फ आयोजन नहीं, बल्कि एक प्रतीक है—उस एकता के विचार का, जो वक्त के साथ धुंधलाने लगा है।
घंटाघर से लेकर शहीद स्थल तक 8 किलोमीटर लंबी पदयात्रा में 7 हजार से अधिक लोग शामिल होंगे। यह आंकड़ा सुनने में जितना बड़ा लगता है, उतना ही बड़ा सवाल भी उठाता है—क्या ये भीड़ पटेल के आदर्शों को आत्मसात करेगी या सिर्फ “सेल्फी विद तिरंगा” तक सीमित रह जाएगी?
सीडीओ अभिनव शाह की बैठक में विभागों को सौंपे गए निर्देशों की सूची देखकर यह जरूर महसूस होता है कि प्रशासन पूरी तत्परता से जुटा है—फूल-मालाओं से लेकर जलपान तक, एंबुलेंस से लेकर यातायात तक, हर बिंदु पर “प्लानिंग” है। लेकिन असली “एकता” तो तब दिखेगी जब ये आयोजन कागजों से बाहर निकलकर समाज में जागरूकता का रूप ले।
काबिलियत की बात करें तो प्रशासनिक मशीनरी ने इस आयोजन को एक भव्य रूप देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। एनसीसी, एनएसएस, पूर्व सैनिक, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, खिलाड़ी, विद्यार्थी—सब इसमें शामिल होंगे। लेकिन व्यंग्य यही है कि जिन युवाओं को राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी समझानी है, वे शायद इस कार्यक्रम में सिर्फ “अटेंडेंस” के लिए पहुंचेंगे।
“एक भारत, श्रेष्ठ भारत” का नारा तभी साकार होगा जब यह यात्रा घंटाघर से निकलकर हर हृदय तक पहुंचे। पटेल की एकता आज भी ज़रूरत है—क्योंकि आज विभाजन सरहदों पर नहीं, विचारों में है। नशा मुक्ति की शपथ, आत्मनिर्भर भारत के नारे और वाद-विवाद प्रतियोगिताएं—सब मिलकर यदि एक नई सोच जगा पाएं, तभी यह यात्रा सार्थक कहलाएगी।
सरदार पटेल के भारत में एकता प्रशासन की नहीं, भावना की जिम्मेदारी थी। इसलिए देहरादून की यह पदयात्रा सिर्फ कदमों की नहीं, विचारों की यात्रा हो—क्योंकि असली श्रद्धांजलि वही होगी जब हर नागरिक अपने भीतर के ‘लौहपुरुष’ को जगा पाए।








